Monday, March 7, 2016

बढ़ती हुई बछड़ियों को क्या खिलाएं?

स्वस्थ बछड़ियों से सर्वोत्तम गाय तैयार करना किसी भी डेयरी फार्म का मुख्य उद्देश्य हो सकता है. बछड़ियों का आहार प्रबंधन बहुत कठिन कार्य है तथा इसके लिए सकल डेयरी बज़ट का लगभग 20% भाग खर्च हो जाता है. बछड़ियों के शीघ्र यौवनावस्था में आने से इन्हें कृत्रिम गर्भाधान द्वारा प्रजनित करवाया जा सकता है ताकि प्रथम ब्यांत पर इनकी आयु अधिक न होने पाए.  सम्पूर्ण शारीरिक विकास एवं भार वृद्धि हेतु बछड़ियों को अधिक ऊर्जा एवं प्रोटीन-युक्त आहार खिलाने की आवश्यकता होती है. यौवनावस्था से पहले दैहिक भार में औसत वृद्धि अधिक होने के कारण दुग्ध-ग्रंथियों का विकास धीमी गति से होने लगता है जो भविष्य में प्रथम दुग्ध-काल की उत्पादन क्षमता को कम कर देता है. यदि प्रथम ब्यांत पर पशु की आयु दो वर्ष से अधिक न हो तो दुग्ध-काल पर इस हानि का प्रभाव कम हो सकता है. अगर बछड़ियों में जन्म से लेकर प्रथम ब्यांत की आयु तक उपयुक्त अनुमान व मूल्यांकन द्वारा आहार प्रबंधन किया जाए तो हमें आदर्श डेयरी हेतु एक बेहतर गाय प्राप्त हो सकती हैं.

दुग्ध-उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रथम ब्यांत पर होल्सटीन गाय की औसत आयु दो वर्ष या इससे कम तथा दैहिक भार 350-500 किलोग्राम तक हो सकता है बशर्ते इन्हें अधिक दाना या सान्द्र के साथ पौष्टिक चारा खिलाया जाएसंकर गायों में प्रथम ब्यांत पर दैहिक भार 300 किलोग्राम के लगभग हो सकता है. यौवनावस्था के बाद अधिक ऊर्जायुक्त आहार खिलाने से दुग्ध-ग्रंथियों के विकास में तेज़ी आती है तथा प्रथम ब्यांत के बाद मिलने वाले दूध की मात्रा भी बढ़ जाती है. अतः जन्म से यौवनावस्था तक होने वाले दैहिक एवं दुग्ध-ग्रंथियों के विकास एवं दुग्ध-उत्पादन क्षमता पर पोषण का प्रभाव सर्वाधिक होता है. दुग्ध-ग्रंथियों के विकास से ही दुग्ध-काल की सीमा तथा दुग्ध-उत्पादन क्षमता निर्धारित होती है. पशुओं में दुग्ध-ग्रंथियां भ्रूणावस्था से ही विकसित होने लगती हैं तथा जन्म के समय ही इनका बाह्य-विकास हो जाता है. इस अवस्था में दुग्ध-नलिकाएं एवं चर्बी तीव्रता से बढ़ती हैं जबकि कृपिकाओं का निर्माण नहीं होता. जन्म से तीन माह तक तथा एक वर्ष से गर्भावस्था के तीन माह तक दूध-ग्रंथियों का विकास दैहिक विकास दर के समान होता है परन्तु इसके बाद दुग्ध-ग्रंथियों का विकास तीव्र हो जाता है. होल्सटीन बछड़ियों में सबसे तेज़ दुग्ध-ग्रंथियों का विकास 3-9 महीने की आयु में होता है जबकि इनका दैहिक भार 100-200 किलोग्राम के बीच होता है. यदि इस समय इन्हें पर्याप्त पोषण न मिले तो इनकी दुग्ध-ग्रंथियां अर्धविकसित रह सकती हैं क्योंकि ग्रहण की गई ऊर्जा का अधिकतम भाग दैहिक विकास हेतु ही उपयोग हो जाता है.
गायों का दुग्ध-उत्पादन दुग्ध-कोशिकाओं की संख्या एवं इनकी स्रवण क्षमता पर निर्भर करता है. द्वितीय दुग्धकाल की तुलना में प्रथम दुग्धकाल के अंतर्गत दुग्ध-ग्रंथियों की उपचय स्थिति भिन्न होती है क्योंकि पशुओं द्वारा आहार के पोषक तत्त्व दुग्धावस्था एवं निरंतर दैहिक विकास हेतु उपयोग में लाए जाते हैं. बछड़ियों को उनकी इच्छानुसार जन्म से 50 दिन तक गाय का दूध पिलाने से दैहिक विकास तीव्रता से होता है तथा वे शीघ्रता से न केवल यौवनावस्था प्राप्त करती हैं बल्कि प्रथम दुग्धकाल में दूध भी अधिक देती हैं. बछड़ियों को दूध की बजाय 35o सेंटीग्रेड तापमान का कृत्रिम दुग्ध-संपूरक देने से भी दैहिक विकास तेज़ी से होता है तथा वे जल्दी यौवनावस्था में आ जाती हैं. बछड़ियों को बाल्टी से सीधे दूध पिलाने की बजाय कृत्रिम निप्पल द्वारा दूध पिलाना अधिक लाभदायक होता है. गाय का स्तन-पान करने वाली बछड़ियों में जन्म के बाद दैहिक भार में अधिक वृद्धि देखी गई है. दुग्ध-संपूरक में ऊर्जा एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने से बछड़ियों की दैहिक विकास दर में वृद्धि लाई जा सकती है. बछड़ियों के जन्म के 2-8 सप्ताह के बीच होने वाले तीव्र दैहिक विकास का दुग्ध-ग्रंथियों पर सकारात्मक प्रभाव देखा गया है. इस समय आहार में ऊर्जा एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने से दुग्ध-कोशिकाओं का विकास दोगुनी गति से होता है.
पशुओं में यौवनावस्था का आगमन आयु की अपेक्षा इनके शारीरिक भार पर अधिक निर्भर करता है. होल्सटीन जैसी बड़ी नस्ल की बछड़ियाँ अक्सर 9-11 माह की आयु में यौवनावस्था प्राप्त करती हैं जब इनका भार 250-280 किलोग्राम के लगभग होता है. गायों की दुग्ध-उत्पादन क्षमता इनके जन्म एवं यौवनावस्था के बीच मिलने वाले पोषण पर निर्भर करती है, परन्तु यौवनावस्था से पूर्व अत्याधिक पोषण के कारण शरीर में चर्बी का जमाव बढ़ने से दुग्ध-कोशिकाओं का विकास धीमा हो सकता है. अतः बछड़ियों के शारीरिक भार में वृद्धि 800 ग्राम प्रतिदिन से अधिक नहीं होनी चाहिए. ऐसा लगता है कि बछड़ियों को अधिक ऊर्जा-युक्त आहार देने से यौवनावस्था तो शीघ्र आ जाती है परन्तु दुग्ध-ग्रंथियों का विकास दैहिक विकास की तुलना में कम होता है. यह स्थिति दुग्ध-कोशिकाओं की संख्या एवं डी.एन.ए. की मात्रा में कमी के कारण उत्पन्न होती है.  अतः इन परिस्थितियों में बछड़ियों को संतुलित आहार दिए जाने की अधिक आवश्यकता है ताकि प्रसवोपरांत इनकी दुग्ध-उत्पादन क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. बछड़ियों में अधिक प्रोटीन-युक्त आहार देने से शारीरिक विकास तीव्रता से होता है तथा मोटापे की समस्या भी नहीं होती. इस प्रकार पशुओं के आगामी दुग्ध-काल एवं दुग्ध-उत्पादन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को रोका जा सकता है.
बछड़ियाँ आगामी दुग्ध-काल कों प्रभावित किए बिना 800 ग्राम प्रतिदिन की दर से 100-300 किलोग्राम तक शारीरिक भार प्राप्त कर सकती हैं. इसके लिए इन्हें 90-110 % तक सकल पाचक तत्वों एवं रुक्ष प्रोटीन की आवश्यकता होती है. पोषण में अधिक सान्द्र अथवा दाना देने से प्रथम दुग्ध-काल में दूध में वसा एवं इसकी मात्रा बढ़ाई जा सकती है परन्तु पशुओं को उनकी इच्छानुसार अधिक दाना देने से भी दूध का उत्पादन कम हो जाता है. ऐसा प्रतीत होता है कि दूध पैदावार हेतु बेहतर आनुवंशिक गुणों वाली बछड़ियों में मोटापा नियंत्रित करने की क्षमता भी अधिक पाई जाती है. यौवनावस्था के बाद तथा गर्भावस्था में उच्च-पोषण स्तर के कारण होने वाले अधिक दैहिक विकास दर का दुग्ध-ग्रंथियों एवं दूध के उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु पोषण गुणवत्ता के कारण प्रथम बार ब्याने वाली गायों में दुग्ध-ग्रंथियों के विकास एवं वृद्धि अवश्य प्रभावित होती है. प्रथम ब्यांत पर बेहतर दैहिक भार वाली गायों की दुग्ध-उत्पादन क्षमता भी अधिक होती है. यौवनावस्था के दौरान दिए गए उच्च-पोषण का प्रथम दुग्ध-काल के दूध उत्पादन पर तो कोई प्रभाव नहीं होता परन्तु इससे सम्पूर्ण दुग्ध-काल में हुई दैहिक भार-वृद्धि कम हो जाती है तथा गाय देरी से मद्काल प्रदर्शित करती है. यदि देखा जाए तो प्रथम दुग्ध-काल में अधिक दूध प्राप्त करने हेतु ब्यांत के समय गाय का दैहिक भार एवं यौवनावस्था के बाद उच्च-वृद्धि दर दोनों ही आवश्यक हैं.
ग्याभिन बछड़ियों को आमतौर पर कम ऊर्जा एवं अधिक रेशे वाले आहार खिलाए जाते हैं ताकि इनकी ऊर्जा-ग्राह्यता को नियंत्रित किया जा सके. प्रसवोपरांत दुग्ध-उत्पादन क्षमता को बनाए रखने हेतु ऐसा करना आवश्यक भी है. गर्भावस्था के 2-6 माह तक पोषण गुणवत्ता का प्रथम ब्यांत के बाद दुग्ध-उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु गर्भावस्था के अंतिम तीन माह में बेहतर आहार खिलाने से दूध अधिक मिलता है. पशुओं में दुग्ध-उत्पादन हेतु अधिक ऊर्जा उपलब्ध करवाने के लिए उपयुक्त पोषण नीति आवश्यक है ताकि जनन क्षमता को अधिक बेहतर बनाया जा सके. बढ़ती हुई बछड़ियों को दैहिक रख-रखाव, विकास तथा गर्भावस्था हेतु प्रोटीन-युक्त आहार की आवश्यकता होती है. अनुसंधान द्वारा ज्ञात हुआ है कि 5-10 माह की बछड़ियों को अपेक्षाकृत कम मात्रा में रुक्ष प्रोटीन खिलाने से दुग्ध-ग्रंथियों का विकास अधिक हुआ. अतः 90-220 किलोग्राम दैहिक भार वाली बछड़ियों को 16% तथा 220-360 किलोग्राम भार वाली बछड़ियों को 14.5% रुक्ष प्रोटीन देने की सिफारिश की जाती है जबकि 360 किलोग्राम से अधिक भार होने पर उन्हें 13% रुक्ष प्रोटीन दिया जा सकता है. आहार नियंत्रण एक ऎसी प्रबंधन विधि है जिसमें सीमित आहार खिला कर पशुओं की पोषण-ग्राह्यता एवं दक्षता को बेहतर बनाया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि यह विधि अधिक रेशा-युक्त आहार खिलाए जाने की तरह ही प्रभावशाली हो सकती है तथा इसका दुग्ध-उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता. वैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि प्रथम ब्यांत की होल्सटीन गायों को प्रसव पूर्व कम ऊर्जायुक्त आहार देने पर दुग्ध-काल के पहले 8 महीनों तक कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया.

निष्कर्षतः संतुलित पशु पोषण दैहिक विकास एवं भार में वृद्धि के साथ-साथ दूध कोशिकाओं में वृद्धि एवं अधिक दुग्ध-उत्पादन हेतु अत्यंत आवश्यक है. आनुवंशिक चयन के कारण पशुओं में शारीरिक वृद्धि दर भी बढ़ती है जिससे इनकी रुक्ष प्रोटीन आवश्यकता अधिक हो जाती है. अतः तेज़ी से बढ़ने वाली बछड़ियों में रुक्ष प्रोटीन व ऊर्जा के मध्य अनुपात अधिक होना चाहिए. 

Monday, February 1, 2016

'ड्राई' या सूखी गायों को क्या खिलाएं?

'ड्राई गायों से अभिप्रायः उन गायों से है जो अभी दूध नहीं दे रही हैं तथा अगले बयांत की प्रतीक्षा में हैं. यदि गायों को शुष्क-काल ('ड्राई' होने) के आरम्भ में रेशेदार एवं कम ऊर्जा-युक्त आहार दें तो प्रसवोपरांत इनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इनके पूर्णतया मिश्रित आहार में गेहूं का भूसा मिलाया जा सकता है ताकि पोषण में ऊर्जा का घनत्व कम किया जा सके. गायों में प्रसव से लगभग तीन सप्ताह पूर्व एवं तीन सप्ताह बाद का समय अत्यंत चुनौती-पूर्ण होता है. पर्याप्त आहार न मिलने से इन्हें प्रसवोपरांत दुग्ध-ज्वर, जेर न गिरना, गर्भाश्य की सूजन, जिगर संबंधी विकार एवं लंगड़ेपन जैसी अनेक व्याधियों से जूझना पड़ सकता है. चर्बी-युक्त जिगर एवं कीटोसिस के कारण स्वास्थ्य को और भी अधिक गंभीर ख़तरा हो सकता है. डेयरी फ़ार्म के लगभग आधे पशु अक्सर इस प्रकार के उपचय संबंधी विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं.  जैसे ही प्रसव का समय समीप आता है, रक्त में प्रोजेस्टीरोन की मात्रा कम होने लगती है जबकि इस्ट्रोजन हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है जिससे प्रसवकाल के आस-पास पशुओं की शुष्क पदार्थ ग्राह्यता कम हो जाती है जबकि इस समय गर्भाश्य में बढते हुए बच्चे को पोषण की सर्वाधिक आवश्यकता होती है.


प्रसवोपरांत दुग्ध-संश्लेषण एवं इसके उत्पादन को बढ़ाने हेतु लैक्टोज की आवश्यकता होती है जो ग्लूकोज से ही निर्मित होता है. आहार का अधिकतम कार्बोज या कार्बोहाइड्रेट तो रुमेन में ही किण्वित हो जाता है, अतः अतिरिक्त ग्लूकोज-माँग की आपूर्ति जिगर द्वारा प्रोपियोनेट से संश्लेषित ग्लूकोज ही कर सकता है. यदि पशु को प्रसवोपरांत आहार कम मिले तो रुमेन में प्रोपियोनेट का उत्पादन कम होने लगता है. ग्लूकोज की कुछ आपूर्ति आहार से प्राप्त अमीनो-अम्लों द्वारा भी की जाती है. इसके अतिरिक्त शरीर की जमा चर्बी का क्षरण भी ग्लूकोज संश्लेषण हेतु किया जाता है. गत एक दशक से पशु-पोषण पर होने वाले अनुसंधान में गायों की उत्पादकता बढ़ाने एवं इन्हें स्वस्थ रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. गायों की प्रसव-पूर्व शुष्क पदार्थ ग्राह्यता एवं अधिक दाना खिला कर आहार का ऊर्जा घनत्व बढ़ाया जा रहा है. इसके लिए पूर्णतया मिश्रित आहार को उपयोग में लाया जा रहा है ताकि प्रसवोपरांत गऊएँ शीघ्रातिशीघ्र अपनी खुराक बढ़ा सकें ताकि प्रसवोपरांत होने वाली स्वास्थ्य संबंधी विकारों से बचा जा सके.
शुष्क गायों की तुलना में नई बयाने वाली गायों को अधिक पोषण घनत्व वाला आहार दिया जाता है. प्रसव से एक या दो सप्ताह पहले गाय की खुराक 10-30% तक कम हो सकती है, अतः पोषण घनत्व बढ़ाने से शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी के बा-वजूद पशु को आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहते हैं. उल्लेखनीय है कि प्रसव-पूर्व शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी के कारण पशु को लगभग 2% अतिरिक्त रुक्ष प्रोटीन की आवश्यकता होती है. गायों को शुष्क-काल के आरम्भ में दीर्घावधि तक आवश्यकता से अधिक ऊर्जा-युक्त आहार देने से संक्रमणकालीन कठिनाइयों में कोई कमी नहीं होती. यदि शुष्क-काल के अंतिम दौर में गायों को अधिक ऊर्जा वाला पूर्णतया मिश्रित आहार खिलाया जाए तो वे प्रसवोपरांत शुष्क पदार्थ ग्राह्यता कम होने से ऋणात्मक ऊर्जा संतुलन की स्थिति में पहुँच जाती हैं तथा इनके रक्त में गैर-एस्टरीकृत वसीय अम्लों तथा बीटा हाइड्रोक्सीबुटाइरिक अम्लों की मात्रा बढ़ जाती है. परन्तु जिन गायों को शुष्क-काल में गेहूं का भूसा मिला कर कम ऊर्जा-युक्त आहार खिलाया गया, उनकी स्थिति कहीं बेहतर पाई गई.
स्पष्टतः जो गाय शुष्क-काल में अत्याधिक ऊर्जा प्राप्त करती हैं उन्हें कीटोसिस, वसा-युक्त जिगर एवं अन्य स्वास्थ्य संबंधी विकारों का अधिक सामना करना पड़ता है. अनुसन्धान द्वारा ज्ञात हुआ है कि शुष्क-काल के आरम्भ में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा-युक्त या भूसा मिला हुआ आहार खिलाना तथा प्रसव के निकट अधिक ऊर्जा-युक्त आहार खिलाना अधिक लाभदायक हो सकता है. प्रसवोपरांत शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी तथा अन्य उपचय सम्बन्धी असंतुलन मुख्यतः गाय के मोटापे से नहीं बल्कि लंबे समय तक अधिक ऊर्जा-युक्त आहार खिलाने से होते हैं. जैसे-जैसे दुग्ध्काल आगे बढ़ता है वैसे-वैसे शुष्क-काल के आरम्भ में कम ऊर्जा-युक्त आहार के कारण मिले लाभ भी कम होने लगते हैं हालांकि इसका सर्वाधिक लाभ तो दुग्ध-काल की अच्छी शुरुआत ही है.
चारे में भूसा मिलाने से इसकी मात्रा बढ़ जाती है तथा धीमी गति से पचने वाले रेशे के कारण रुमेन का स्वास्थ्य बेहतर होता है जिससे यह सामान्य ढंग से कार्य करता है तथा भरा हुआ होने के कारण ब्यांत के समय उदार की स्थिति भी प्रभावित नहीं होती. कम ऊर्जा वाले अन्य आहार जैसे ‘जों’ में इस तरह के गुण नहीं मिलते. दीर्घावधि तक आवश्यकता से अधिक ऊर्जा मिलने से इंसुलिन का प्रभाव भी कम होने लगता है. शुष्क-काल के दौरान आहार में अधिक ऊर्जा देने से प्रसव-पूर्व एक सप्ताह में शुष्क-पदार्थ ग्राह्यता कम हो जाती है. अतः शुष्क-काल में गायों की ऊर्जा ग्राह्यता कम करके इनकी प्रसवोपरांत भूख में सुधार लाया जा सकता है. ऐसा करने से शरीर के रिजर्व वसा में कोई कमी नहीं होती तथा जिगर में वसा की जमावट भी नहीं होती.  इसलिए आहार का ऊर्जा घनत्व 1.25-1.35 मेगा कैलोरी प्रति किलोग्राम शुष्क पदार्थ उपयुक्त रहता है.

उपर्युक्त तथ्यों का कदाचित यह अर्थ नहीं हो सकता कि गायों को आहार में ऊर्जा देनी ही नहीं चाहिए बल्कि इन्हें ऐसा पूर्णतया मिश्रित आहार खिलाएं जिसमें पर्याप्त पाचन योग्य प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज-लवणों की मात्रा हो. भिन्न-भिन्न प्रकार के आहार खिलाने से ऊर्जा की मात्रा पर नियंत्रण करने में कठिनाई होती है, अतः पूर्णतया मिश्रित आहार में भूसा मिलाने से ऊर्जा घनत्व को कम करना ही लाभदायक रहता है. शुष्क-काल के आरम्भ में ‘साइलेज’ के साथ शुष्क पदार्थ के आधार पर 20-30% कटा हुआ भूसा देने से ऊर्जा घनत्व 1.3 मेगा कैलोरी प्रति किलोग्राम शुष्क पदार्थ तक लाया जा सकता है. भूसे को 5 सेंटीमीटर से बारीक काटना चाहिए ताकि गाय इन्हें छोड़ कर अन्य आहार कणों को न खा जाए. सामान्यतः गायों को इस तरह के आहार खाने की आदत बनाने में एक सप्ताह तक का समय लग सकता है. सम्भव है इस दौरान इन पशुओं की दैनिक शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कुछ कमी आ जाए परन्तु बाद में यह सामान्य स्तर पर पहुँच जाती है. आहार में उपयोग किए गए भूसे की गुणवत्ता बेहतर होनी चाहिए. भूसा साफ़-सुथरा, सूखा एवं फफूंद से मुक्त होना चाहिए. आमतौर पर गेहूं का भूसा सर्वोत्तम रहता है क्योंकि यह रुमेन में अधिक देर तक रुक सकता है जिससे न केवल पाचन दक्षता में सुधार होता है बल्कि प्रसवोपरांत गाय के उदर की स्थिति भी सामान्य बनी रहती है. यदि पोषण के नज़रिए से देखा जाए तो भूसा महँगा लगता है परन्तु रेशों के बेहतर स्रोत एवं पाचक गुणों के कारण कोई अन्य चारा इसका स्थान नहीं ले सकता.

Saturday, January 30, 2016

मशीन मिल्किंग द्वारा दूध निकालें

आधुनिक मशीन मिल्किंग प्रणाली का सर्वप्रथम उपयोग डेनमार्क व नीदरर्लैंड में हुआ. आजकल यह प्रणाली दुनिया भर के हज़ारों डेयरी फार्मों द्वारा उपयोग में लाई जा रही है. मशीन मिल्किंग का एक छोटा प्रारूप भी है जिसे 10 से भी कम पशुओं के लिए सुगमता से उपयोग में लाया जा सकता है. इसके द्वारा गायों व भैंसों का दूध अधिक तीव्रता से निकाला जा सकता है. मशीन मिल्किंग में पशुओं की थन कोशिकाओं को कोई कष्ट नहीं होता जिससे दूध की गुणवत्ता तथा उत्पादन में वृद्धि होती है.


मशीन मिल्किंग की कार्य प्रणाली बहुत सरल है. यह पहले तो निर्वात द्वारा स्ट्रीक नलिका को खोलती है जिससे दूध थन में आ जाता है जहाँ से यह निकास नली में पहुँच जाता है. यह मशीन थन मांसपेशियों की अच्छी तरह मालिश भी करती है जिससे थनों में रक्त-प्रवाह सामान्य बना रहता है. मशीन मिल्किंग द्वारा दूध निकालते हुए गाय को वैसा ही अनुभव होता है जैसाकि बछड़े को दूध पिलाते समय होता है. मशीन मिल्किंग द्वारा दूध की उत्पादन लागत में काफी कमी तो आती ही है, साथ साथ समय की भी भारी बचत होती है. इसकी सहायता से पूर्ण दुग्ध-दोहन संभव है जबकि परम्परागत दोहन पद्धति में दूध की कुछ मात्रा अधिशेष रह जाती है. मशीन द्वारा लगभग 1.5 से 2.0 लीटर तक दूध प्रति मिनट दुहा जा सकता है. इसमें न केवल ऊर्जा की बचत होती है बल्कि स्वच्छ दुग्ध दोहन द्वारा उच्च गुणवत्ता का दूध मिलता है.

गाय तथा भैंस के थनों के आकार एवं संरचना में अंतर होता है, इसलिए गाय का दूध दुहने वाली मशीन में आवश्यक परिवर्तन करके इन्हें भैसों का दूध निकालने हेतु उपयोग में लाया जा सकता है. भैसों के दुग्ध दोहन हेतु अपेक्षाकृत भारी क्लस्टर, अधिक दाब वाला वायु निर्वात एवं तीव्र पल्स दर की आवश्यकता होती है. क्लस्टर का बोझ सभी थनों पर बराबर पड़ना चाहिए. सामान्यतः गाय एवं भैंस का दूध निकालने के लिए एक ही मशीन का उपयोग किया जाता है जिसमें वायु निर्वात दाब लगभग एक जैसा ही होता है परन्तु भैंसों के लिए पल्स दर अधिक होती है. मशीन मिल्किंग का समुचित लाभ उठाने के लिए इसका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए. दूध निकालने वाला ग्वाला तथा भैंस दोनों का मशीन से परिचित होना आवश्यक है. यदि भैंसें मशीन के शोर से डरती हैं अथवा कोई कष्ट अनुभव करें तो वे दूध चढ़ा लेंगी जिससे न केवल डेयरी या किसान को हानि हो सकती है अपितु मशीन मिल्किंग प्रणाली से विश्वास भी उठ सकता है.

नव-निर्मित डेयरी फ़ार्म में मशीन मिल्किंग को धीरे-धीरे उपयोग में लाना चाहिए ताकि भैंसें एवं उनको दुहने वाले व्यक्ति इससे भली-भाँति परिचित हो जाएँ. किसी भी फ़ार्म पर मशीन मिल्किंग आरम्भ करने से पहले निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है.

• दुग्ध-दोहन करने वाले व्यक्ति को मशीन मिल्किंग का प्रशिक्षण इसकी निर्माता कंपनी द्वारा दिया जाना चाहिए ताकि उसे मशीन चलाने के साथ साथ इसकी साफ़-सफाई एवं रख-रखाव संबंधी पूर्ण जानकारी मिल सके.

• सबसे पहले प्रथम ब्यांत की भैंसों का दूध मशीन द्वारा निकालना चाहिए क्योंकि इन्हें हाथ से दूध निकलवाने की आदत नहीं होती. ऐसी भैंसों के थन, आकार एवं प्रकार में लगभग एक जैसे होते हैं तथा अधिक उम्र की अन्य भैंसों के विपरीत इनकी थन-कोशिकाएं भी स्वस्थ होती हैं.

• सर्वप्रथम दूध दुहने के समय शांत रहने वाली भैसों को ही मशीन मिल्किंग हेतु प्रेरित करना चाहिए. प्रायः जिन भैसों को हाथ द्वारा दुहने में कठिनाई होती हो, वे मशीन मिल्किंग के लिए भी अनुपयुक्त होती हैं.

• दूसरे एवं इसके बाद होने वाले ब्यांत की भैंसों को हाथ से दुहते समय, मशीन मिल्किंग पम्प चलाते हुए क्लस्टर को समीप रखना चाहिए ताकि भैंस को इसके शोर की आदत पड़ जाए. भैंस को इस प्रकार मशीन का प्रशिक्षण देते समय बाँध कर रखना चाहिए ताकि वह शोर से अनियंत्रित न हो सके.

• मशीन को भैंसों के निकट ही रखना चाहिए ताकि वे न केवल इन्हें देख व अनुभव कर सकें बल्कि इससे उत्पन्न होने वाले शोर से भी परिचित हो सकें.

• मशीन द्वारा दूध निकालते समय यदि भैंस असहज अनुभव करे तो पुचकारते हुए उसके शरीर पर हाथ फेरना चाहिए ताकि वह सामान्य ढंग से दूध निकलवा सके.

उपर्युक्त बातों का ध्यान रखते हुए भैसों को शीघ्रता से मशीन द्वारा दुग्ध-दोहन हेतु प्रेरित किया जा सकता है. फिर भी कई भैंसें अत्यधिक संवेदनशील एवं तनाव-ग्रस्त होने के कारण मशीन मिल्किंग में पूर्ण सहयोग नहीं कर पाती. ऐसी भैंसों को परम्परागत ढंग से हाथ द्वारा दुहना ही उचित रहता है. मशीन मिल्किंग प्रणाली को अपनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन तथा सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है. इसके द्वारा स्वच्छ दुग्ध उत्पादन सुनिश्चित होता है. इसकी सहायता से डेयरी किसान अपनी कार्यकुशलता में वृद्धि ला सकते हैं, जिससे दूध की उत्पादन लागत में काफी कमी लाई जा सकती है.

यदि दिन में दो बार की अपेक्षा तीन बार दूध निकाला जाए तो पूर्ण दुग्ध-काल में 20% तक अधिक दूध प्राप्त हो सकता है. स्वच्छ दूध स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है तथा बाजार में इसके अच्छे भाव भी मिलते हैं. इस प्रकार निकाले गए दूध में कायिक कोशिकाओं तथा जीवाणुओं की संख्या काफी कम होती है जो इसके अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होती है. दूध में किसी प्रकार की कोई बाहरी अशुद्धि जैसे धूल, तिनके, बाल, गोबर अथवा मूत्र मिलने की कोई संभावना नहीं रहती. इस प्रक्रिया में ग्वाले के खाँसने व छींकने से फैलने वाले प्रदूषण की संभावना भी नहीं रहती. आजकल मिल्किंग मशीने कई माडलों में उपलब्ध हैं जैसे एक बाल्टी वाली साधारण मशीन अथवा बड़े डेयरी फ़ार्म हेतु अचल मशीन. सुगमता से उपलब्ध होने के कारण इन्हें आजकल स्थानीय बाजार से अत्यंत स्पर्धात्मक दरों पर खरीदा जा सकता है.

Thursday, January 28, 2016

पशु परिवहन कैसे करें?

आजकल पशुओं को विभिन्न व्यावसायिक कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ता है. इन परिस्थितियों में पशुओं के चोटिल एवं तनावग्रस्त होने की संभावना सर्वाधिक होती है. पशुओं को अधिकतर ऐसे ट्रकों में लाद कर ले जाया जाता है, जिसमें खड़े रहने के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं होती. इन्हें लंबे समय तक बिना पानी या चारे के यात्रा हेतु मजबूर किया जाता है, जिससे कई पशु रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. जो पशु अपने गंतव्य स्थल पर पहुँचते हैं, वे शारीरिक व मानसिक रूप से अत्याधिक तनाव-ग्रस्त हो जाते है, फलस्वरुप इन्हें सामान्य अवस्था में लाने के लिए कई दिन लग जाते हैं. अतः परिवहन के दौरान पशु कल्याण पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है. 

पशु परिवहन में जोखिम 

लगातार कई घंटे तक सफर करने से पशुओं का शारीरिक भार दस प्रतिशत तक कम हो जाता है. पशु परिवहन के दौरान इनकी रोग-प्रतिरोध क्षमता भी कम हो जाती है तथा ये जल्द ही रोगों से ग्रस्त होने लगते हैं. ऐसे पशुओं में मृत्यु दर भी अधिक होती है. एक अनुसंधान रिपोर्ट के अनुसार बछड़ों का रोग-प्रतिरोध तंत्र पूर्णतया विकसित नहीं होता है. ये लंबे सफर के दौरान अपना शारीरिक तापमान नियंत्रित नहीं रख पाते तथा ताप- एवं शीत-घात सहने में असमर्थ होते हैं. परिणाम-स्वरुप ये बछड़े परिवहन के बाद बीमार हो जाते हैं तथा इनमें मृत्यु दर बढ़ने की आशंका अधिक होती है.
  1. आजकल पशुओं को भी मनुष्य की भांति तनाव-रहित एवंकल्याणकारी वातावरण में रहने का अधिकार है ताकि येअधिक बेहतर ढंग से मानव-जाति के काम  सकेंपशुकल्याण  केवल कानूनी दृष्टि से आवश्यक है,परन्तु इसकेकई मानवीय पक्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण हैंपशुओं कोपरिवहन के लिए ले जाते समय निम्न-लिखित बातों पर ध्यानदेना अत्यंत आवश्यक है-
    • पशुओं के मालिकों एवं प्रबंधकों का यह दायित्व है कि जिन पशुओं को परिवहन द्वारा अन्यत्र ले जाना है, उनका स्वास्थ्य ठीक हो तथा वे यात्रा करने के लिए पूर्णतया सक्षम हों. 
    • पशुओं के परिवहन हेतु एक उपयुक्त वाहन की आवश्यकता होती है ताकि सफर के दौरान पशुओं को कोई परेशानी या तनाव न हो. 
    • परिवहन हेतु प्रयुक्त वाहन में प्रत्येक पशु हेतु न्यूनतम स्थान की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है. इस सम्बन्ध में पशु चिकित्सक से परामर्श अवश्य ही कर लेना चाहिए. 
    • पशु-परिवहन से पूर्व मौसम अनुकूल होना चाहिए ताकि यात्रा के दौरान इन्हें स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना न करना पड़े. 
    • यात्रा के दौरान पशुओं की देख-रेख के लिए एक प्रशिक्षित व्यक्ति का साथ होना अनिवार्य है. यदि कोई और व्यक्ति उपलब्ध न हो तो यह गाड़ी के चालक का दायित्व है कि वह समय-समय पर पशुओं पर नज़र बनाए रखे. 
    • यात्रा के दौरान निश्चित समय पर गाड़ी रोक कर पशुओं को आराम देना आवश्यक है. आपात परिस्थितियों में चिकित्सकीय उपकरण एवं परामर्श हेतु पशु-चिकित्सक उपलब्ध होना चाहिए. 
    • पशुओं के खरीदार व विक्रेता दोनों का ही यह कर्तव्य है कि पशुओं के लदान व इन्हें गंतव्य स्थल पर उतारने के लिए समुचित व्यवस्था उपलब्ध हो. 
    • पशुओं को परिवहन हेतु वाहन पर चढ़ाते व उतारते समय इनके साथ मानवीय व्यवहार होना चाहिए. पशुओं के लिए लंबे सफर के दौरान चारे व पानी की भी समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए. 
    • रोगी पशुओं का परिवहन अत्यंत सावधानी से होना चाहिए ताकि किसी बीमारी का फैलाव न हो. परिवहन से पहले व बाद में वाहन को कीटाणु-नाशक घोल द्वारा साफ़ किया जाना चाहिए.
    ·         यात्रा की अधिकतम समयावधि पशुओं की आयु एवं दैहिक अवस्था पर निर्भर करती है. अधिक आयु वाले तथा ग्याभिन पशु अधिक समय तक यात्रा नहीं कर सकते. परिवहन के अंतर्गत होने वाली घटनाओं का लिखित उल्लेख लोग-बुक में किया जाना आवश्यक होता है.
    ·         पशुओं के परिवहन से सम्बंधित सभी पक्षों के लिए यह अनिवार्य है कि इसके लिए निर्धारित सभी नियमों एवं मापदंडों का अनुपालन कड़ाई से किया जाए ताकि यात्रा के दौरान उच्च-स्तरीय पशु-कल्याण व्यवस्था को सुनिश्चित किया जा सके.
    परिवहन हेतु वाहन
    परिवहन हेतु प्रयुक्त होने वाला वाहन पशुओं के आकार, प्रकार एवं भार पर निर्भर करता है. इस वाहन के अंदर की ओर कोई भी तीखी लोहे की कीलें या छडें नहीं होने चाहिएं क्योंकि इनसे पशुओं को शारीरिक आघात हो सकता है. वाहन को खराब मौसम से बचाने के लिए पर्याप्त छत की व्यवस्था होनी चाहिए. वाहन की बनावट पशुओं के लिए हवादार व आरामदेह होनी चाहिए ताकि धूप के समय इसका तापमान अधिक न होने पाए. वाहन में यथा-सम्भव कम से कम कोने या गड्ढे हों ताकि सफर के दौरान वाहन में मल-मूत्र जमा न होने पाए तथा इसकी सफाई आसानी से हो सके. ज्ञातव्य है कि साफ़-सुथरे पशु-वाहनों में रोगों का संक्रमण रोकना भी सम्भव हो सकता है. ये वाहन यांत्रिक दृष्टि से मजबूत बनावट वाले होने चाहिएं. वाहन में मल-मूत्र की निकासी हेतु पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पशुओं को गन्दगी से बचाया जा सके.  वाहन का फर्श चिकना नहीं होना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो नीचे पुआल आदि बिछाई जा सकती है.  वाहन में पशुओं के लिए बैठने का स्थान, उनके बैठने या खड़े रहने की प्रवृत्ति से भी निर्धारित होता है. सामान्यतः सूअरों तथा ऊंटों को बिठा कर व गायों, भैंसों, और  घोड़ों को खड़ा करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है. खड़ी अवस्था में ले जाए जाने वाले पशुओं को अपना संतुलन बनाए रखने के लिए वाहन में पर्याप्त स्थान उपलब्ध होना चाहिए. जब पशु खड़े हों तो उनका सर वाहन की छत से नहीं टकराना चाहिए. वाहन में पशुओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक पशु का निरीक्षण आसानी से किया जा सके. छोटे आकार के जंतुओं को क्रेट में ले जाने के कारण छत नीचे रहती है अतः इनका निरीक्षण कठिन होता है. ऐसे में इनके लिए लगातार लंबा सफर ठीक नहीं रहता. परिवहन के लिए पशुओं को ले जाते समय इनका बीमा करवाना भी ठीक रहता है. ऐसा करने से परिवहन के दौरान जोखिम का ख़तरा कम हो जाता है. यदि सफर सामान्य से अधिक लंबा हो तो इन्हें चारा व पानी दे कर ही परिवहन हेतु आगे ले जाना चाहिए.
    एक जैसे पशु इकट्ठे ले जाएँ
    एक ही ग्रुप में रहने वाले पशुओं को एक साथ परिवहन हेतु ले जाना चाहिए क्योंकि ये एक दूसरे के स्वभाव से परिचित होते हैं तथा इनमें एक प्रकार का सामाजिक सम्बन्ध भी स्थापित हो जाता है. आपस में लड़ने वाले पशुओं को कभी भी एक साथ न ले जाएँ. कम आयु के पशुओं को, अधिक आयु के पशुओं के साथ भी ले जाना ठीक नहीं होता. इसी तरह सींग वाले पशुओं के साथ, बिना सींग वाले पशुओं का परिवहन नहीं होना चाहिए. विभिन्न प्रजाति के पशुओं को एक साथ ले जाना भी हितकारी नहीं है क्योंकि इनके स्वाभाव एक दूसरे के विपरीत हो सकते हैं. जिन पशुओं को पूर्व में परिवहन का अनुभव होता है उन्हें अन्यत्र ले जाने में अपेक्षाकृत कम कठिनाई होती है. अस्वस्थ पशुओं का परिवहन नहीं होना चाहिए परन्तु यदि यह कार्य चिकित्सा हेतु किया जा रहा है तो स्वीकार्य होता है. अतः परिवहन हेतु पशुओं का चुनाव सावधानी-पूर्वक किया जाना चाहिए. अंधे, बीमार, कमज़ोर अथवा लंगड़ेपन जैसी व्याधियों से पीड़ित पशु परिवहन हेतु अनुपयुक्त होते हैं. शीघ्र ही ब
    ब्याने वाले पशुओं को भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जाना चाहिए. इसी प्रकार जो पशु शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल या बहुत मोटे हों, वे विपरीत वातावरणीय परिस्थितियों व लंबे सफर के तनाव को नहीं झेल सकते. अतः ऐसे पशुओं का परिवहन भी नहीं होना चाहिए. परिवहन के दौरान पशुओं के व्यवहार का समुचित ध्यान रखना चाहिए. क्योंकि जो कार्य एक प्रजाति के पशु के हित में हो वह दूसरी प्रजातियों के पशुओं के भी हित में हो, यह आवश्यक नहीं है. इसलिए पशुओं के परिवहन हेतु योजनाबद्ध ढंग से कार्य होना चाहिए.
    परिवहन हेतु लदान
    पशुओं को वाहन में चढाते समय उत्तेजित नहीं करना चाहिए. लदान का कार्य किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देख-रेख में ही संपन्न होना चाहिए. लदान के दौरान पशुओं से किसी प्रकार की मार-पीट नहीं होनी चाहिए अन्यथा उन्हें गहरी चोट लग सकती है. पशुओं को चढाने के लिए तैयार की गई ढलान व रास्ते इनके आकार एवं क्षमता के अनुकूल होने चाहिएं ताकि इन्हें चढ़ते समय कोई परेशानी न हो. वाहन में प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पशुओं को चढ़ते समय कोई डर न लगे. आवश्यकता से अधिक पशुओं का परिवहन करते समय उन्हें वाहन में ठूंसना नहीं चाहिए अन्यथा दम घुटने से इनकी मृत्यु भी हो सकती है. वाहन में लदान के समय किसी भी प्रकार का बल-प्रयोग अनुचित होता है. छोटे पशुओं जैसे बकरी आदि को उठा कर भी वाहन में चढाया जा सकता है परन्तु इन्हें पटकना नहीं चाहिए. लदान के बाद वाहन को अपेक्षाकृत कम गति पर ही चलाना चाहिए ताकि पशुओं को यात्रा के दौरान झटके आदि न लगें. एक दम ब्रेक अथवा गति देने से पशुओं को धक्का लगता है तथा ये चोटिल भी हो सकते हैं. अतः इस कार्य के लिए प्रशिक्षित वाहन चालक को ही कार्य पर लगाया जाना चाहिए. यात्रा के दौरान थोड़े-थोड़े अंतराल पर पशुओं को देखते रहना चाहिए. स्वस्थ पशुओं का परिवहन करते समय वाहन में किसी मृत पशु को नहीं ले जाना चाहिए. यात्रा के दौरान पशुओं की चारे व पानी की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहनी चाहिए. लंबे सफर के दौरान पशुओं को आराम करने का समय भी दिया जाना चाहिए क्योंकि ये लंबे सफर का तनाव झेलने में अक्षम होते हैं.
    पशुओं को वाहन से कैसे उतारें?
    गंतव्य स्थल तक पहुँचने तक पशु बहुत थक जाते हैं. इन पशुओं को सावधानीपूर्वक ही वाहन से उतारना चाहिए. किसी प्रकार की जल्दी पशुओं के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है. ध्यातव्य है कि पशुओं को नीचे उतारते समय वाहन व प्लेटफार्म का स्तर एक जैसा हो. प्लेटफार्म की ढलान में किसी तरह की फिसलन नहीं होनी चाहिए. पशुओं को उतारते समय अनावश्यक शोर-गुल नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे पशुओं में खलबली मच सकती है. सफर के दौरान चोटिल हुए पशुओं को तुरंत ही चिकित्सक की सुविधा मिलनी चाहिए. ऐसे पशुओं को अन्य पशुओं से अलग रखा जाना चाहिए. पशु परिवहन के दौरान पशुओं में रोग संक्रमण होने की संभावना सर्वाधिक होती है अतः ऐसे वाहनों को प्रयोग के बाद कीटाणुनाशक घोल द्वारा साफ़ करना चाहिए ताकि अन्य पशुओं का परिवहन करते समय कोई रोग न फैलने पाए. वाहन से उतारने के बाद पशुओं की चिकित्सकीय जांच आवश्यक होती है ताकि प्रभावित पशुओं का समय पर इलाज किया जा सके. पशुओं को पर्याप्त चारा व पेय जल उपलब्ध करवाना चाहिए ताकि ये धीरे-धीरे अपने सामान्य जीवन की ओर लौट सकें. यूरोप में पशु परिवहन हेतु बनाए गए नियमों का पालन बड़ी कड़ाई से किया जाता है. यहाँ मांस के उत्पादन में प्रयुक्त छोटे जानवरों जैसे सूअर, बकरी व कम आयु वाले पशुओं के परिवहन हेतु अधिकतम समय सीमा छः घंटे ही निर्धारित की गई है जबकि गायों के लिए यह अवधि बारह घंटे तक हो सकती है.

    परिवहन के दौरान पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार न केवल विधि-संगत है अपितु पशु-कल्याण सुनिश्चित करने से इनकी उत्पादकता एवं कार्यकुशलता में भी सुधार होता है. हालांकि भारत में परिवहन के दौरान पशु कल्याण का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा जाता परन्तु यूरोप में इनके परिवहन के लिए दूरी एवं समय दोनों को ही यथा-सम्भव कम रखा जाता है. अतः परिवहन के समय पशु कल्याण सम्बन्धी व्यवस्था करने से डेयरी किसानों एवं पशु-पालकों को पूरा लाभ मिल सकता है।



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Monday, January 18, 2016

वर्तमान परिदृश्य में डेयरी पशु कल्याण

आजकल कृषि के साथ डेयरी पशुपालन का व्यवसाय किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है. परन्तु अधिक लाभ कमाने के लिए कुछ लोग पशुओं को चलती-फिरती फैक्टरी समझने लगते हैं जो सर्वथा अनैतिक है तथा पशु कल्याण हेतु स्थापित माप-दंडों का उल्लंघन है. पशुओं के कल्याण के विषय में सोचना न केवल हमारी नैतिक जिम्मेवारी है अपितु यह क़ानून संगत भी है कि हम पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार करें. डेयरी पशु भी मानव की भांति प्रशिक्षित हो सकते हैं तथा उनमें शारीरिक वेदना अनुभव करने की शक्ति होती है. अतः इनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है. यदि हम अपने पशुओं के कल्याण के बारे में चिंतित रहेंगे तो ये भी हमारी सेवा अधिक बेहतर ढंग से कर पाएंगे. यूं तो पशु कल्याण एक बहु-आयामी विषय है, फिर भी निम्न-लिखित बिंदुओं पर ध्यान देकर हम पशुओं के लिए अधिक कल्याणकारी वातावरण सुनिश्चित कर सकते हैं.
संकर नस्ल प्रजनन
आजकल गायों से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए संकर प्रजनन प्रणाली अपनायी जा रही है जिसमें इनके कल्याण से जुडी अनेक समस्याओं की अनदेखी हो रही है. हालांकि पशु स्वास्थ्य एवं कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए परन्तु कई बार छोटे आकार की नस्लों से अपेक्षाकृत बड़े आकार के होल्सटीन बच्चे पैदा किए जाते हैं जिससे स्थानीय नस्ल की गायों को प्रसवकाल के दौरान न केवल अधिक पीड़ा होती है अपितु यह इनके लिए जानलेवा भी हो सकता है. कम दूध देने वाले पशुओं को हटा कर विदेशी नस्लों से तैयार संकर पशु आर्थिक दृष्टि से तो उपयुक्त प्रतीत होते हैं परन्तु कुछ समय बाद इनमें प्रतिकूल वातावरणीय परिस्थितियों के कारण स्वास्थ्य संबंधी विकार उत्पन्न होने लगते हैं. अक्सर देखा गया है कि संकर नस्ल के पशु विपरीत वातावरणीय परिस्थितियों में स्वयं को ढाल नहीं पाते तथा शीघ्र ही बीमार हो जाते  हैं.  कभी-कभी संकर प्रजनन डेयरी पशुओं के लिए एक बड़ी चुनौती भी हो सकता है. इसलिए संकर प्रजनन करवाते समय सभी सम्बंधित पक्षों पर विचार करना आवश्यक है.
लंगड़ापन
यह पशुओं के लिए अत्यंत दुखदायी परिस्थिति है जिससे निजात पाना आवश्यक है. लंगड़ापन कई कारणों जैसे कुपोषण, दोषपूर्ण प्रजनन अथवा खराब आवासीय व्यवस्था से हो सकता है. हमें पशुओं के खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि उनकी हड्डियां मजबूत बनी रहें. लंगड़ापन जन्मजात विकृतियों के कारण भी हो सकता है. यदि पशुओं को चलने-फिरने योग्य पर्याप्त जगह न मिले तो इनकी टांगों में विकार हो सकते हैं जो सामान्य ढंग से चलने में बाधक होते हैं. परिवहन के दौरान पशुओं के साथ लापरवाही बरतने पर भी उन्हें मांसपेशियों में अत्याधिक खिंचाव होने का भय रहता है जिससे ये लंगड़े हो सकते हैं. कई बार पशुओं में भय के कारण मची भगदड़ भी लंगड़ेपन का कारण बन सकती है. अतः ऐसी सभी विपरीत परिस्थितियों में इनके कल्याण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है.
थनैला
यह रोग पशुओं के अयन में जीवाणुओं के संक्रमण के कारण होता है. इस रोग का फैलाव पशुओं को दुहते समय पर्याप्त साफ़-सफाई न रखने व संक्रमित अयन पर मक्खियों के बैठने से होता है. इसके कारण पशु को बहुत दर्द एवं असुविधा का सामना करना पड़ता है. यदि इस रोग का उपयुक्त उपचार न किया जाए तो यह जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है. इस रोग के कारण दूध में कायिक कोशिकाओं की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है. संक्रमित पशुओं का दूध मानव उपयोग हेतु अनुपयुक्त हो जाता है. इस रोग के कारण डेयरी किसानों को न केवल आर्थिक हानि होती है बल्कि यह पशुओं के स्वास्थ्य एवं कल्याण में भी बाधक होता है. यह रोग अक्सर अधिक दुग्ध उत्पादित करने वाले पशुओं में होता है. हमारी देशी नस्लों की तुलना में यह रोग संकर नस्ल की गायों में कहीं अधिक होता है.
आवासीय व्यवस्था
यदि गायों को रहने के लिए पर्याप्त आवासीय स्थान उपलब्ध न करवाया जाए तो यह उनके कल्याण में बड़ी बाधाएं उत्पन्न कर सकता है. संकर प्रजनन द्वारा तैयार की गई कुछ गायों का आकार बहुत बड़ा होता है परन्तु शहरी इलाकों में इन्हें रहने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है. बहुत-सी गायों को अक्सर तंग स्थान पर ठूंस दिया जाता है जहां ये अन्य पशुओं से टकराती रहती हैं जिससे इनमें तनाव बढ़ जाता है. अत्याधिक तनाव के कारण गाय आपस में लड़ती रहती हैं तथा डेयरी की उत्पादन क्षमता भी गिर जाती है. गायों को बैठने व लेटने के लिए छत वाली जगह के साथ-साथ टहलने के लिए भी पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है. आवासीय समस्याओं से निजात पाने के लिए पशुओं को शहर के बाहर खुले स्थानों पर रखना अधिक बेहतर होता है. तंग स्थान पर पशुओं को सांस लेने के लिए ताज़ी हवा भी नहीं मिलती जिसके अभाव में ये अस्वस्थ रहते हैं. इसलिए गायों को प्रति-दिन कुछ समय बाहर खुले क्षेत्र में घास चरने एवं घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए. ऐसा करने से पशु सामाजिक दृष्टि से आपस में जुड़े रहते हैं तथा इन्हें कोई तनाव जैसी परेशानी भी नहीं झेलनी पड़ती. पशु खुली हवा में विचरण करने के कारण शारीरिक दृष्टि से भी हृष्ट-पुष्ट रहते हैं तथा इनका व्यवहार भी सामान्य बना रहता है.
पोषण एवं पेय जल
      स्वस्थ जीवन के लिए पोषण एवं जल का महत्व सर्वाधिक होता है परन्तु      गायों को पर्याप्त चारा व जल आपूर्ति न मिलने से ये कुपोषण का शिकार हो जाती हैं. ऐसी अवस्था में इनकी उत्पादकता भी कम हो जाती है. चारे के अभाव में कुछ लोग अपनी गायों को खुला छोड़ देते हैं तथा ये आवारा घूमते हुए जो भी मिल जाए- खा लेती हैं, जो ठीक नहीं है. ऎसी परिस्थितियों में कई बार गाय अखाद्य तथा जहरीली वस्तुएँ भी खा सकती है. आजकल लोग पोलीथीन की थैलियों में सब्जियों व फलों के छिलके बाहर फैंक देते हैं. भूखी होने के कारण गाय इन्हें थैली सहित निगल जाती है जिससे इनका पाचन तंत्र अवरुद्ध हो जाता है तथा जान भी जा सकती है.  अतः लोगों को चाहिए कि वे अपनी गायों के लिए चारे का प्रबंध घर पर ही करें.  बाहर खुले में प्यास लगने पर गाय पोखर या नाली का प्रदूषित जल पी कर बीमार हो सकती हैं क्योंकि इस प्रकार कई विषैले एवं भारी धातुओं के रसायन इनके शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. अतः इन परिस्थितियों में इनके कल्याण की उपेक्षा करना उचित नहीं है.
नर बछड़े
संकर नस्ल की गायों को उत्पादित करते समय जो नर बछड़े पैदा होते हैं, उनकी कोई उपयोगिता नहीं होती. परिणाम-स्वरुप ऐसे बछड़ों को या तो खाने के लिए पर्याप्त आहार नहीं मिलता या इन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ दिया जाता है. कुछ लोग इन्हें यहाँ से पकड़ कर बूचड़-खाने में भेज देते हैं. यह सब आर्थिक कारणों से होता है क्योंकि कोई भी डेयरी किसान अनुत्पादक पशुओं को चारा नहीं खिलाना चाहता. इन बछड़ों की अल्पायु एक नैतिकता से जुडी समस्या बन गई है. क्या प्रसवोपरांत इन बछड़ों को सामान्य देख-भाल पाने का अधिकार नहीं है? क्या इनका कल्याण किसी विवेकपूर्ण ढंग से सम्भव नहीं है? आज ऐसे कई प्रश्नों का हल खोजने के लिए एक सार्थक पहल की आवश्यकता है. प्रजनन करवाते समय ऐसे वीर्य का उपयोग किया जा सकता है जिसमें बछड़ी पैदा होने की संभावनाएं अधिक हों. यदि फिर भी आवश्यक हो तो कुछ बछड़ों को प्रजनन हेतु उन्नत सांड के रूप में बड़ा किया जा सकता है. कुछ बछड़ों को बैल के रूप में चारा या गोबर उठाने के लिए डेयरी के काम में लाया जा सकता है.
पशु परिवहन
पशुओं को परिवहन द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय इनके कल्याण पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता जो सर्वथा अनुचित है. आवश्यकता से अधिक पशुओं को अपेक्षाकृत छोटे आकार के वाहनों में ठूंस-ठूंस कर भर दिया जाता है. कई घंटों की थका देने वाली यात्रा के बाद कुछ पशुओं की या तो मृत्यु हो जाती है या वे चलने-फिरने में सक्षम नहीं रहते. आजकल यूरोप में पशुओं की ढुलाई केवल विशेष प्रकार के वाहनों में ही की जा सकती है तथा प्रत्येक आठ घंटे के सफर के बाद इन्हें अनिवार्यतः विश्राम दिया जाता है. भारतवर्ष में पशु कल्याण संबंधी क़ानून तो हैं परन्तु इनका अनुपालन कड़ाई से नहीं होता है,  जिसके कारण पशुओं को बहुत कष्ट झेलना पड़ता है. सफर के दौरान पशुओं को हिलने-जुलने हेतु पर्याप्त जगह देना आवश्यक है. अतः परिवहन के दौरान किसी प्रकार के बॉक्स या क्रेट उपयोग में नहीं लाए जा सकते क्योंकि ये पशुओं के लिए आरामदेह नहीं होते. इसी प्रकार लंबी यात्रा के दौरान पशुओं के लिए पर्याप्त चारे एवं जल की व्यवस्था भी होनी चाहिए.
दुग्ध-दोहन
गायों से दूध प्राप्त करते समय इनके कल्याण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यदि दुग्ध-दोहन के समय पशु को कोई पीड़ा अथवा तनाव न हो तो यह अधिक मात्रा में दूध देता है. हाथों से दूध दुहते समय पशुओं को कोई पीड़ा नहीं होनी चाहिए. दूध निकालने का समय एवं ढंग न केवल यथासम्भव आरामदेह हो बल्कि यह पशु-अयन के स्वास्थ्य के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए. यदि दुग्ध-दोहन के दौरान स्वच्छता पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाए तो पशुओं में थनैला रोग होने की संभावना बढ़ सकती है. आजकल मशीन द्वारा दूध निकाला जाता है ताकि कार्य शीघ्रता एवं सुगमता से संपन्न हो सके. यदि दुधारू गायों को इसकी आदत हो जाए तो मशीन मिल्किंग पशुओं के लिए अपेक्षाकृत अधिक आरामदायक होती है.
जैव-विविधता
भारत में गायों की बहुत-सी नस्लें मिलती हैं जो अपने क्षेत्र के वातावरण के अनुकूल होती हैं. इन सभी नस्लों की अपनी विशिष्ट पहचान तथा उपयोगिता होती है. कोई नस्ल केवल अधिक दूध उत्पादन के लिए होती है तो कोई खेतों में काम करने के लिए. अतः किसानों को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ही इन नस्लों का चयन करना चाहिए. यदि गर्म इलाकों के पशुओं को सर्द स्थानों पर रहने के लिए भेजा जाए तो इससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इसी प्रकार सर्द वातावरण में अनुकूलित पशु अधिक गर्मी झेलने में अक्षम होते हैं. आजकल डेयरी फ़ार्म को एक व्यवसाय के रूप में अपनाते समय इन सब बातों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है ताकि पशुओं के कल्याण के साथ कोई समझौता न करना पड़े. प्रजनन करवाते समय यह सोचना चाहिए कि कहीं हम अधिक दुग्ध-उत्पादन के लालच में अनावश्यक संकर प्रजनन द्वारा गौवंशीय पशुओं की जैव-विविधता को कोई गंभीर ख़तरा तो उत्पन्न नहीं कर रहे हैं. यदि गोवंश की विशेष नस्लों में उसी नस्ल के चयनित सांडों द्वारा प्रजनन करवाया जाए तो हमें उत्तम गुणों के पशु प्राप्त हो सकते हैं तथा ऐसा करने से जैव-विविधता भी बनी रहती है.
उन्नत पशु प्रबंधन
आजकल बड़े डेयरी फार्मों पर आधुनिक एवं विकसित पशु प्रबंधन प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं. इन प्रणालियों से दैनिक कार्यों का निष्पादन तीव्रता से सम्भव है परन्तु कई बार पशुओं को भारी तनाव भी झेलना पड़ सकता है. पशुओं को सींग रहित करने का कार्य किसी भी उन्नत डेयरी फ़ार्म के लिए नितांत आवश्यक हो सकता है. सींग रहित पशु आपस में लड़ाई नहीं करते जिससे इन्हें चोट लगने का कोई ख़तरा नहीं होता. परन्तु व्यस्क पशुओं के सींग काटने से उन्हें बहुत कष्ट होता है. सींगो को हटाने का काम यथासम्भव जन्म के एक माह के अंदर संपन्न कर लेना चाहिए ताकि पशुओं को न्यूनतम पीड़ा हो. इसी प्रकार विभिन्न टीकाकरण कार्य करते समय पशुओं को भय-मुक्त वातावरण में रखना आवश्यक है ताकि ये सब गतिविधियां इनके लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकें. पशुओं को पोषण एवं जल की आपूर्ति भी भली-भांति की जानी चाहिए ताकि वे अपनी इच्छा एवं आवश्यकतानुसार चारा व जल प्राप्त कर सकें. कई बार चारा चरने की जगह फर्श से अधिक ऊँची होती है जिसमें पशुओं को चरने में कठिनाई हो सकती है. चारा एवं जल इस प्रकार से व्यवस्थित होना चाहिए कि इसके लिए पशु को किसी प्रकार का संघर्ष न करना पड़े. पशुओं के लिए धूप एवं छाँव की आवश्यकता भी मानव की तरह ही होती है, अतः इन्हें भी उसी प्रकार अधिक गर्मी एवं सर्दी से बचाया जाना चाहिए.

आजकल शहरों में कई लोग अपने अनुत्पादित पशुओं को बाहर आवारा छोड़ देते हैं. ये पशु सड़कों एवं बाज़ारों में न केवल दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं, बल्कि इन्हें कई दिन तक भूखा भी रहना पड़ता है. ये पशु पर्याप्त पोषण न मिलने से तनावग्रस्त हो जाते हैं तथा कई बार आपस में लड़ने लगते हैं. ऐसे पशुओं को तुरंत निकटस्थ गौशाला में भेज देना चाहिए ताकि वहाँ इन्हें बेहतर पोषण प्राप्त हो सके. निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण मानवता का कल्याण पशुओं के समुचित कल्याण में निहित है.

जब दूध सस्ता हो तो किसान क्या करें?

हमारे डेयरी किसान गाय और भैंस पालन करके अपनी मेहनत से अधिकाधिक दूध उत्पादित करने में लगे हैं परन्तु यह बड़े दुःख की बात है कि उन्हें इस ...