Thursday, March 30, 2017

डेयरी व्यवसाय से लाभ कैसे मिलेगा?

डेयरी व्यवसाय से लाभ कैसे मिलेगा?
डेयरी किसानों की सबसे बड़ी समस्या है कि जो दूध वह उत्पादित करते हैं, उन्हें बाज़ार में उसका खरीदार ही नहीं मिलता और अगर खरीदार मिल भी गया तो इसका पूरा मूल्य नहीं मिलता. किसानों की शिकायत है कि वे प्रति लीटर दूध उत्पादन पर अधिक खर्च करते हैं किन्तु उन्हें इसका लागत मूल्य भी नहीं मिलता. आइए, आज हम आपकी इस समस्या का हल निकालने की कोशिश करते हैं.
यह बात तो सही है कि नई तकनीकियाँ आने के बाद हमारे किसान उन्नति की राह में पीछे छूट रहे हैं. अब यह तो संभव ही नहीं है कि हम अपने किसानों को रातों-रात शिक्षित बना दें लेकिन उन्हें कुछ ऐसा अवश्य ही करना चाहिए जैसे आजकल हमारे शिक्षित नौजवान अपना काम कर रहे हैं.
गाय की डेयरी से हमें कई प्रकार के उत्पाद एवं उपोत्पाद प्राप्त होते हैं. इनमें दूध, गोबर, मूत्र तथा बचा हुआ घास-फूस आदि प्रमुख हैं. अगर आप अपने पशुओं का गोबर बेचेंगे तो संभव है कोई खरीदने को ही तैयार न हो. अगर कोई खरीदार मिल भी गया तो वह इसके मामूली दाम ही देगा. यही हाल दूध का है. दूध में बढ़ती हुई मिलावट की प्रवृत्ति ने ईमानदार किसानों को भी कहीं का नहीं छोड़ा है. जो किसान स्वच्छ दुग्ध-उत्पादन करते हैं उन्हें दूध बेचने में कोई विशेष परेशानी नहीं होती. कई लोग दूध निकालते समय सफाई आदि का ध्यान नहीं रखते, जिससे इसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है.
बड़ी डेयरियों के टैंकर तो हज़ारों लीटर दूध खरीदते हैं जिसमें थोडा बहुत खराब भी खप जाता है. छोटे डेयरी मालिकों के लिए ऐसा करना संभव नहीं है. दूध की मात्रा इतनी कम होती है कि कोई दूध खरीदने वाला इन तक नहीं पहुँच पाता. दूध जल्द ही खराब होने वाला आहार है, अतः निकलने के तुरंत बाद ही इसका प्रसंस्करण करना आवश्यक होता है. ऐसा करने से दूध की शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है अर्थात यह अधिक देर तक खराब हुए बिना रह सकता है. डेयरी किसानों को अपनी डेयरी में लगाए निवेश का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए.
• गोबर को व्यर्थ फैंकने से बेहतर है कि इसके उपले बना कर बेचे जाएं ताकि अधिक मूल्य प्राप्त हो.
• बचे-खुचे भूसे, मॉल-मूत्र एवं चारा अवशेषों को गला-सड़ा कर केंचुओं की सहायता से वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है. इसकी बाज़ार में मांग बहुत अच्छी है तथा यह सात से आठ रूपए प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा सकती है.
• जिन किसानों के पास अपने संसाधन हैं वे चाहें तो गोबर गैस प्लांट भी लगा सकते हैं जिससे डेयरी की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति मुफ्त में हो सकती है.
• स्वच्छ दुग्ध-उत्पादन करें ताकि साफ़-सुथरे और मिलावट रहित दूध को देख कर ग्राहक जल्दी से खरीदने की सोचे.
• जो लोग शहरों से अधिक दूर नहीं रहते, वे दूध से खोया तैयार करके  हलवाइयों को बेच सकते हैं जो अत्यंत लाभकारी है. मैंने मथुरा और आगरा के आसपास बहुत से डेयरी किसानों को ऐसा करते हुए देखा हैं.
• दूध से पनीर बनाना भी आसान है जिसे आप स्वयं अथवा सब्जी वालों के माध्यम से अच्छे दाम में बेच सकते हैं. आजकल होटलों और ढाबों में भी इसकी खूब मांग है.
• अगर आपके आस-पास छोटी डेयरियाँ हों तो आप अपने पशुओं के दूध की फैट निकलवा सकते हैं जिसे ‘क्रीम’ कहा जाता है. यह क्रीम या तो लोकल डेयरी वाले खरीद लेते हैं या फिर आप इस क्रीम से मक्खन एवं घी तैयार करके बेच सकते हैं.
• उपर्युक्त वर्णित सभी उत्पाद तैयार करने में कोई ज्यादा मेहनत नहीं है परन्तु मुनाफा अच्छा मिल सकता है. डेयरी के काम में अगर साख अच्छी हो तो ग्राहक आपके द्वार पर लाइन लगा कर खड़े रहते हैं क्योंकि अच्छी चीज़ की सभी कद्र करते हैं.
• अगर आप प्रतिदिन दो सौ लीटर से अधिक दूध उत्पादित करते हैं तो एक चिल्लिंग टैंक रखा जा सकता है ताकि दूध अधिक समय तक खराब न हो. ऐसी डेयरियों को कई बड़ी कम्पनियां अनुदान एवं सहायता भी देती हैं तथा ये बदले में सारा दूध खरीद लेती हैं.
• गाँव के छोटे किसान मिल कर अपनी सहकारी संस्था भी बना सकते हैं ताकि शहर के लोग छोटा समझ कर आपका शोषण न कर सकें. सारे गाँव का दूध एक स्थान पर इकठ्ठा करके अच्छे दामों में बेचा जा सकता है.
• डेयरी पशुओं हेतु यथा संभव नई तकनीकी अपनाएं ताकि आपका व्यवसाय अधिक साफ़-सुथरा एवं लाभकारी बन सके. पुराने समय में दूध की मांग अधिक थी परन्तु कोई बेचने वाला नहीं था. आजकल परिस्थितियाँ बदल रही हैं. दूध की मांग के साथ-साथ इसका उत्पादन बहुत बढ़ गया है.
• कई लोग अपनी डेयरी को इतना सुन्दर तथा आकर्षक बनाते हैं कि वे इसे लोगों को दिखाने के लिए भी रूपए वसूल करते हैं. क्या आपकी डेयरी में कोई ऐसा आकर्षण है?
• अगर डेयरी अच्छी हो तो दूध भी अच्छा होगा और आप दूध के लिए मुँह-मांगे दाम प्राप्त कर सकते हैं. आखिर कोई तो बात है जो भाग्य-लक्ष्मी जैसी डेयरी गाय के दूध को अस्सी रूपए प्रति लीटर तक बेच सकती है जबकि हमारे किसान पच्चीस-तीस रूपए तक भी मुश्किल से पहुँच पाते हैं!
आशा है कि आप उपर्युक्त वर्णित बातों पर ध्यान देते हुए ही अपने डेयरी व्यवसाय को आगे बढ़ाएंगे. ऐसा करने से सफलता अवश्य ही आपके कदम चूमेगी, मुझे विश्वास है!

Thursday, March 23, 2017

क्या डेयरी व्यवसाय लाभकारी है?


आजकल देश में बढती हुई बेरोजगारी के कारण हमारे युवा स्वरोजगार के अवसर तलाश करने लगे हैं. डेयरी पशु पालन के क्षेत्र में असीम संभावनाएँ होने के कारण इनका इस ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है. वैसे भी कई राज्यों की सरकारें नई डेयरी स्थापित करने हेतु न केवल आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध करवा रही हैं बल्कि सब्सिडी की व्यवस्था भी की गई है. अगर प्रथम दृष्टया देखा जाए तो इस व्यवसाय हेतु किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती परन्तु डेयरी फार्मिंग का व्यवसाय इतना आसान भी नहीं है कि इस क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति सफल हो जाए! जो लोग जल्दबाजी में डेयरी की स्थापना कर लेते हैं, उन्हें इस कार्य की तकनीकी बारीकियों की जानकारी नहीं होती तथा उन्हें अंत में असफलता ही हाथ लगती है. इसके कई कारण हो सकते हैं.
हमारे युवा पढ़े-लिखे तो हैं परन्तु वे अत्यधिक महत्त्वकांक्षी भी हैं. उन्हें लगता है कि डेयरी की स्थापना करते ही दूध की पैदावार होने लगेगी और मुनाफा बढ़ता चला जाएगा. वे पहले दिन ही अपने पशुओं की संख्या को प्रतिदिन मिलने वाले दूध से गुणा कर देते हैं ताकि उन्हें अपनी डेयरी के दैनिक दुग्ध-उत्पादन की जानकारी मिल सके. अति-उत्साही डेयरी मालिक तो इसे 365 से गुणा करके अपनी डेयरी के वार्षिक दुग्ध-उत्पादन का आकलन करने में कोई देर नहीं लगाते जबकि ये लोग इस व्यवसाय से जुड़े कई जोखिमों को पूरी तरह नज़र-अंदाज़ कर देते हैं. ज्ञात रहे कि गायों का दुग्ध-काल एक निश्चित अवधि या 305 दिन के लिए ही होता है.  दुग्धावस्था के अंतिम तीन महीनों में इनका दुग्ध-उत्पादन धीरे-धीरे घटता जाता है.
दुग्ध-व्यवसायी अपने फ़ार्म को दूध बनाने वाली फैक्ट्री समझने की भूल कर देते हैं. डेयरी कोई दूध बनाने वाली ऑटोमैटिक मशीन नहीं होती बल्कि इसमें दूध का निर्माण गायों द्वारा उनकी दुग्ध-ग्रंथियों में होता है. दुग्ध-ग्रंथियों के विकास के लिए गाय का ग्याभिन होना अत्यंत आवश्यक है. गर्भावस्था के दौरान ही गाय की दुग्ध-ग्रंथियां दुग्ध-उत्पादन हेतु तैयार होती हैं. गायों को समय पर गर्भित करवाने हेतु इनका मद्काल प्रदर्शन करना अनिवार्य है. यदि कोई किसान अपनी गाय के मद्काल की पहचान न कर पाए तो उसे अगले मद्काल के लिए इक्कीस दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है. कई बार उपयुक्त पोषण की कमी से भी पशु मद्काल में नहीं आते. जिन लोगों को गाय के स्वास्थ्य एवं प्रजनन संबंधी जानकारी नहीं होती, वे इनसे दूध लेते रहते हैं तथा इसे समय पर ग्याभिन नहीं करवा पाते. ऎसी परिस्थितियों में इनका दूध सूख जाता है तथा ग्याभिन न होने के कारण दुग्ध-ग्रंथियां भी नष्ट होने लगती हैं.
यदि गाय को देरी से ग्याभिन करवाया जाए तो इसे पूरी गर्भावस्था में चारा एवं दाना खिलाना पड़ता है जबकि दूध न मिलने के कारण इनसे कोई आमदनी भी नहीं होती. जो डेयरी किसान गायों के व्यवहार से भली भांति परिचित होते हैं, वे इन्हें समय पर गर्भित करवा देते हैं ताकि गाय न्यूनतम समयावधि के लिए ही अनुत्पादक रहे. इस तरह की सभी बातें कुशल डेयरी प्रबंधन के अंतर्गत आती हैं. डेयरी में स्वस्थ गायों के अतिरिक्त बीमार गाय भी हो सकती है. गायों की भी मृत्यु होती है जिनका स्थान नवजात बछड़ियों के गाय बनने पर ही भरा जाता है. यदि नवजात बछड़ियों की उपयुक्त देखभाल न की जाए तो इनकी मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है. गाय अत्यंत संवेदनशील प्राणी है जिसे हमारी तरह गर्मी-सर्दी का अनुभव होता है. यदि इनके आवास, खान-पान एवं प्रबंधन आवश्यकताओं पर पूरा ध्यान न दिया जाए तो डेयरी का सञ्चालन एक घाटे का सौदा हो सकता है.
गाय और बछड़ियों का खान-पान उनकी दैहिक अवस्था से प्रभावित होता है. बछड़ियों को दैहिक वृद्धि के लिए आहार की आवश्यकता है जबकि ग्याभिन गाय को अपने गर्भ में पलने वाले बछड़े हेतु पौष्टिक पोषण की आवश्यकता होती है. गाय द्वारा दुग्धावस्था में लिया गया पोषण इसके दुग्ध-उत्पादन पर निर्भर करता है. एक लाभदायक डेयरी व्यवसाय हेतु पूँजी तथा मानव संसाधन के साथ-साथ इस क्षेत्र में प्रशिक्षण भी अनिवार्य है. डेयरी के व्यवसाय को समर्पित भाव से करने की आवश्यकता पड़ती है. यदि हमारे डेयरी पशु स्वच्छ वातावरण में नहीं हैं तो वे स्वस्थ नहीं रह सकते. उल्लेखनीय है कि केवल स्वस्थ पशु ही अधिकतम दुग्ध-उत्पादन करने में सक्षम होते हैं. कुछ लोगों की मान्यता है कि जब इस व्यवसाय को अनपढ़ किसान कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं? ऐसा सोचना भी सही है परन्तु सच तो यह है कि हमारे किसान डेयरी पशुओं को अपने लाभ के लिए नहीं रखते. इनके पास तो बहुत कम दूध देने वाले पशु होते हैं जिन्हें खेतों का बचा-खुचा घास ही खाने को मिलता है. किसान अपने पशुओं से जो दूध लेते हैं, उसे अपने घर में ही उपयोग कर लेते हैं क्योंकि इनके लिए दूध पैदा करना कोई व्यापार नहीं है.

विदेशों में आजकल बड़ी-बड़ी डेयरियाँ स्थापित की जाती हैं क्योंकि अधिक पशुओं की देख-रेख एक साथ करने पर कम खर्च आता है. यहाँ अधिकतर कार्य मशीनों द्वारा होता है जिससे कार्य-कुशलता बढ़ती है. डेयरी उद्यमी अपने पशुओं को पोषण विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई खुराक ही खिलाते हैं ताकि यह न केवल स्वास्थ्यवर्धक हो बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी सस्ती हो. डेयरी पशुओं के स्वास्थ्य पर नज़र रखने के लिए ये लोग प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों पर ही भरोसा करते हैं. यही कारण है कि बेहतर प्रबंधन वाले बड़े डेयरी फ़ार्म छोटी एवं मझोली डेयरियों से कहीं अधिक लाभकारी हो सकते हैं. नई डेयरी की स्थापना करने पर अधिक धन का खर्च होता है जबकि लाभ प्राप्त करने में अक्सर अधिक समय लगता है.

Sunday, February 19, 2017

डेयरी पशुओं को ऍफ़.एम.डी. रोग से बचाएँ!


ऍफ़.एम.डी. रोग: मुँह-खुर या ऍफ़.एम.डी. रोग विषाणुओं (वायरस) द्वारा फैलने वाला एक संक्रामक रोग है जो गाय, बकरी, भेड़, सूअर आदि कई प्रजातियों में देखा गया है. यह रोग पशुओं से मनुष्यों में नहीं फैलता, परन्तु इसका संक्रमण रोग-ग्रस्त पशुओं से अथवा दूषित वायु, जल, चारे के माध्यम से भी हो सकता है. संक्रमित पशुओं के दूध को 20 मिनट से अधिक समय तक उबालने पर इस रोग के विषाणु या वायरस नष्ट हो सकते हैं. बड़े डेयरी फार्म में तो संक्रमित पशुओं को बाहर निकालना (कल्लिंग करना) ही एक उपयुक्त विकल्प हो सकता है. इस वायरस की लगभग सात किस्में हैं जो पशुओं में मुँह पका-खुर पका रोग के फैलने के लिए उत्तरदायी हैं. सभी वायरस प्रजातियों को नष्ट या निष्क्रिय करने के लिए कोई भी टीका बाज़ार में उपलब्ध नहीं है. वायरस संक्रमण यदि ऍफ़.एम.डी. का टीका संक्रमित पशु में मौजूद वायरस प्रजाति से मेल न खाए तो इसका कोई लाभ नहीं होता. संक्रामक ऍफ़.एम.डी. वायरस की पहचान केवल आधुनिक प्रयोगशाला में ही संभव है. इस रोग के कारण डेयरियों को अत्याधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ती है. अतः इस रोग से बचाव हेतु अपने पशुओं को ऍफ़.एम.डी. से बचाव के टीके अवश्य लगवाएँ. ये टीके सभी सरकारी पशु-अस्पतालों में मुफ्त मिलते हैं.
रोग लक्षण: ऍफ़.एम.डी. विषाणु से संक्रमित होने के चौबीस घंटे से दस दिन की अवधि तक पशु में इस रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं. कुछ पशुओं में रोग लक्षण प्रकट होने में इससे अधिक देरी भी हो सकती है. बुखार होना, मुँह एवं खुर पर जख्म होना, भूख न लगना, शारीरिक भार में कमी आना, दूध उत्पादन में गिरावट होना, मुँह से लार व झाग निकलना, कंपकंपी होना, लंगड़ा कर चलना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं.
उपचार: लक्षण प्रकट होने पर कोई कारगर उपचार नहीं है परन्तु मुँह एवं खुर के जख्मों को पोटाशियम परमैंगनेट के घोल में धोया जा सकता है ताकि संक्रमण अन्य पशुओं तक न फ़ैल सके. मुँह के घावों पर ग्लिसरीन का उपयोग करना चाहिए. खुरों को पानी एवं फिनाइल के मिश्रण से धोया जा सकता है. पशुओं को खाने के लिए नर्म चारा ही देना चाहिए ताकि मुँह के घावों के कारण इसे खाने में कोई परेशानी न हो. रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से सदैव दूर रखना चाहिए. स्वस्थ पशुओं में इस रोग के फैलाव को रोकने के लिए बचाव टीक अर्थात ऍफ़.एम.डी. वैक्सीन का प्रयोग करना चाहिए हालांकि सभी वर्गों के विषाणुओं को नष्ट करने हेतु फिलहाल कोई एक वैक्सीन बाज़ार में उपलब्ध नहीं है.
टीकाकरण: ऍफ़.एम.डी. के निष्क्रिय विषाणुओं को टीके द्वारा पशु के शरीर में पहुँचा देते हैं जिससे वह पशु अपनी रोग-प्रतिरोध क्षमता विकसित करने लगता है. पशुओं को भविष्य में संक्रमण होने पर यह रोग-प्रतिरोध क्षमता इनके बचाव में सहायक होती है. तीन से चार महीने की बछड़ी या बछड़े को पहला ऍफ़.एम.डी. बचाव टीका दिया जा सकता है. इसके एक महीने बाद दूसरा बूस्टर टीका लगवाना चाहिए ताकि इसकी प्रतिरोध क्षमता में सुधार हो सके. बाद में हर छह महीने के अंतराल पर ऍफ़.एम.डी. टीके लगवाने चाहिएं ताकि इस रोग के प्रकोप से बचा जा सके. ऍफ़.एम.डी. के टीके हर साल फरवरी-मार्च तथा सितम्बर-अक्टूबर के महीने में लगाए जा सकते हैं.
बाज़ार में उपलब्ध वैक्सीन: इस रोग से बचाव हेतु बहुत –सी कंपनियों की वैक्सीन उपलब्ध है. उदहारण के लिए एम.एस.डी. द्वारा बेची जाने वाली ऍफ़.एम.डी. वैक्सीन सीरो-टाइप ए, ओ तथा एशिया-1 विषाणुओं के लिए प्रतिरोधी है जो गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि में ऍफ़.एम.डी. संक्रमण रोकने हेतु दिया जा सकता है. बड़े पशुओं में इसकी मात्रा दो मिली तथा छोटे पशुओं में एक मिली इंट्रा-मस्कुलर टीके द्वारा दी जाती है. सभी रोग-प्रतिरोधी टीके पशु-चिकित्सक के परामर्श एवं सहायता से ही पशुओं को लगाए जाने चाहिएं.
सावधानियाँ: अपने पशुओं हेतु सदैव अच्छी कंपनी द्वारा निर्मित वैक्सीन का ही उपयोग करें. वैक्सीन को हमेशा ठन्डे स्थान पर या फ्रिज में ही रखें. उच्छ-तापमान पर यह प्रभावहीन हो जाती है. बीमार अथवा रोग-ग्रस्त पशुओं को बचाव टीका न लगवाएँ. टीका लगाने से पूर्व इसे अच्छी तरह हिला लें. यथासंभव ठन्डे मौसम में ही टीकाकरण होना चाहिए. टीकाकरण अन्य पशुओं की उपस्थिति में न करें क्योंकि इससे कुछ पशु डर कर तनावग्रस्त हो सकते हैं. टीका लगाने के बाद मामूली सूजन हो सकती है जो एक सामान्य बात है. आवश्यकता पड़ने पर वहाँ एंटीसेप्टिक दवा का प्रयोग किया जा सकता है.

Friday, July 22, 2016

यूरिया उपचार विधि से भूसे की गुणवत्ता बढ़ाएँ!

पशुओं को खिलाए जाने वाले चारे में भूसे का अहम योगदान होता है परन्तु इसमें इनके रख-रखाव हेतु पर्याप्त पोषक तत्त्व नहीं मिलते. यूरिया से उपचारित करने पर भूसे में रुक्ष प्रोटीन एवं ऊर्जा की मात्रा अधिक हो जाती है जिसे पशुओं को खिलाने पर दैहिक वृद्धि एवं दुग्ध-उत्पादन बढ़ जाता है.
यूरिया उपचार विधि क्या है?
विभिन्न अनुसंधान परीक्षणों के परिणाम के अनुसार 4% यूरिया का छिडकाव करके भूसे में लगभग 40% आर्द्रता के स्तर को उपयुक्त पाया गया है. यूरिया में मिलाने के लिए शुद्ध जल की आपूर्ति भी आवश्यक है. लगभग 25 क्विंटल भूसे में एक क्विंटल यूरिया और 1000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. यूरिया को सोखने के लिए सामान्यतः दो से तीन सप्ताह की अवधि पर्याप्त होती है परन्तु ठन्डे स्थानों पर अपेक्षाकृत अधिक समय देना पड़ सकता है. उपचारित भूसे को एक खड्डे में दबाया जाता है जिसका आकार लगभग दो मीटर लम्बा हो सकता है तथा इसकी चौड़ाई व गहराई एक मीटर रखी जा सकती है. इसे ऊपर से पोलिथीन ‘शीट’ द्वारा ढक दिया जाता है ताकि बाहरी नमी इसमें प्रवेश न कर सके. अधिक नमी में फफूंद उग जाती है तथा भूसा खराब होने का भय रहता है. इस तरह के खड्डे धूप से दूर होने चाहिएं. सूखे एवं अकालग्रस्त स्थानों पर यूरिया उपचार हेतु स्वच्छ जल की आपूर्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इसके लिए तालाबों का गन्दा जल उपयोग में नहीं लाना चाहिए क्योंकि इसमें फफूंद उगने का खतरा बढ़ जाता है.
यह तकनीकी कैसे काम करती है?
सूक्ष्मजीवियों द्वारा यूरिया के अपघटन से अमोनिया उत्पन्न होती है. ये सूक्ष्मजीवी सामान्यतः नमी-युक्त भूसे में पाए जाते हैं जो बाद में यूरिएज़ एंजाइम उत्पन्न करते हैं. अमोनिया भूसे में अवशोषित हो जाती है जिससे इसमें नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है. इस उपचार विधि से भूसे में रेशों की पाचकता भी अधिक हो जाती है.
आरम्भ में इसे पशु कम खाते हैं परन्तु बाद में आदत होने पर ये चाव से खाने लगते हैं. इसे पहली बार खिलाते समय पशुओं के सामान्य चारे में मिला कर देना चाहिए. बाद में धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ा देनी चाहिए ताकि पशु इसे खाने में कोई अरुचि न दिखाएं. अमोनिया की तीव्र गंध से मुक्ति पाने के लिए उपचारित भूसे को कुछ समय खुली हवा में फैला देना चाहिए ताकि पशु इसे खाने में आना-कानी न करें.
इस तकनीकी का महत्त्व क्या है?
अनुसन्धान द्वारा ज्ञात हुआ है कि यूरिया उपचारित भूसा खिलाने से बछड़ों की आहार ग्राह्यता 10 से 15% बढ़ जाती है तथा इनमें 100 से 150 ग्राम प्रतिदिन की  वृद्धि दर मिलती है. उपचारित भूसे के कारण पशुओं का दुग्ध-उत्पादन भी एक से डेढ़ लीटर प्रतिदिन तक बढ़ जाता है. यूरिया से उपचारित करने पर भूसे की पाचनशीलता बढ़ जाती है तथा इसे पशु बड़े चाव से खाते हैं. शुष्क-पदार्थ पाचनशीलता एवं सकल पचनीय पोषक तत्त्व 10 % तक बढ़ जाते हैं जबकि रुक्ष प्रोटीन की मात्रा बढ़ कर लगभग तीन गुणा हो जाती है.
यह तकनीकी तभी सफल हो सकती है जब इसे किसी पशु-पोषण विशेषज्ञ की देख-रेख में अपनाया जाए. पोषक भूसे हेतु यूरिया उपचार विधि में ज़रा-सी गलती भी पशुओं के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है. यूरिया को शुद्ध जल में घोलना और भूसे पर एक जैसा छिडकाव करना एक जटिल प्रक्रिया है परन्तु इसे मशीनों द्वारा अवश्य ही आसानी से किया जा सकता है. डेयरी किसानों के अनुसार यह अत्यधिक मेहनत वाला काम है जबकि इससे मिलने वाला लाभ बहुत सीमित है. यदि छिडकाव के बाद इस भूसे को ढक कर न रखा जाए तो यह खराब भी हो सकता है.
उपचारित भूसे की उपयोगिता
जिन स्थानों पर हरा चारा पर्याप्त मात्रा में मिलता है, वहां के किसान इस तकनीकी में विशेष रूचि नहीं दिखाते परन्तु सूखे और अकालग्रस्त स्थानों पर यह तकनीकी बहुपयोगी सिद्ध हो सकती है. हालांकि आमतौर पर हरे चारे के साथ भूसा मिला कर ही पशुओं को खिलाया जाता है परन्तु उपचारित भूसे को बिना मिलावट के ही खिलाया जा सकता हैं. उत्तर भारत में अधिकतर गेंहूं एवं धान की खेती की जाती है. धान की कटाई के बाद गेहूं के लिए खेत तैयार करना होता है, ऐसे में भूसे को फैलाने के लिए पर्याप्त खाली जगह उपलब्ध नहीं होती है. धन की पुआल के उपलब्ध होने के समय बरसीम भी आसानी  से मिल जाता है जिसे साधारण भूसे के साथ मिला कर भी दिया जा सकता है. किसानों द्वारा हर साल गेहूं एवं धान की फसलों  के बचे हुए अवशेषों को जलाने से न केवल प्रदूषण फैलता है बल्कि मिटटी में पाए जाने वाले लाखों लाभदायक कीट भी जल कर नष्ट हो जाते हैं. यदि फसलों के इन सूखे अवशेषों को यूरिया से उपचारित करके पशुओं को खिलाया जाए तो चारे की कमी से जूझ रहे पशुओं को एक बड़ी राहत मिल सकती है. उपचारित भूसा पर्याप्त पोषक तत्त्वों से भरपूर है तथा यह अकालग्रस्त स्थानों के पशुओं को आवश्यक पोषण आसानी से उपलब्ध करवा जा सकता है.
तकनीकी को अपनाने में बाधाएं
सीमान्त एवं भूमिहीन किसान इस तकनीकी को अपनाने में कोई रूचि नहीं लेते क्योंकि वे अपने पशुओं को बाहरी स्थानों पर घास चराने के लिए ले जाते हैं. ऐसे में उपचारित भूसे को तैयार करने हेतु वे कोई अतिरिक्त धन खर्च नहीं करना चाहते. डेयरी किसान अपने पशुओं से प्राप्त अधिकतर दूध को घर में ही उपयोग कर लेते हैं तथा ये लोग इसे बेचने में कम ही रूचि लेते हैं.  ऐसे किसानों को अपने पशुओं से अधिक दूध प्राप्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती. गाँवों के किसान यूरिया को विभिन्न फसलों हेतु खाद के रूप में प्रयोग करते हैं अतः उन्हें यूरिया को इस तरह काम में लेना स्वीकार्य नहीं है. अगर देखा जाए तो यह तकनीकी केवल उन स्थानों पर अपनाई जा सकती है जहां हरे चारे की कमी है तथा भूसा आसानी से उपलब्ध है. अगर पानी और सस्ते मजदूरों की उपलब्धता आसानी से हो तो किसान इस तकनीकी को आसानी से अपना सकते हैं. भूसे को अच्छी तरह मिलाने के लिए मजदूरों की आवश्यकता होती है जो कुछ महंगा लग सकता है. इस तकनीकी के अधिक लोकप्रिय न होने के लिए शायद यह भी एक कारण है.

यदि इस तकनीकी को सामूहिक रूप से अपनाया जाए तो उपचारित भूसा तैयार करने हेतु इस विधि पर अपेक्षाकृत कम खर्च आता है. गर्मियों में गेहूं का भूसा बहुतायत में उपलब्ध होता है जबकि इसकी मांग काफी कम होती है. इस भूसे को यूरिया द्वारा आसानी से उपचारित करके अधिक पोषक बनाया जा सकता है. उपचारित भूसे को खनिज मिश्रण के साथ खिलाने पर पशुओं की रख-रखाव की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है. यदि सूखे की मार झेल रहे किसानों को इस कार्य हेतु अच्छी तरह शिक्षित एवं प्रशिक्षित किया जाए तो यह साधारण भूसे की पोषण क्षमता बढाने वाली एक सस्ती और बेहतर तकनीकी सिद्ध हो सकती है.

Friday, July 1, 2016

क्या बकरी का दूध गाय के दूध से बेहतर है?


आजकल समूचे विश्व में गाय का दूध ही सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है परन्तु अक्सर देखने में आया है कि कुछ लोग इसे आसानी से हजम नहीं कर सकते. कुछ लोगों की मान्यता है कि गायों से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए इन्हें हारमोन, आनुवंशिक रूप से परिवर्तित चारे तथा विभिन्न प्रकार के टीके दिए जा रहे हैं. इनके चारे में दुर्घटनावश विषाक्त पदार्थों के प्रवेश होने से भी गाय के दूध की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे में बकरियों का दूध एक स्वास्थ्यवर्धक पेय के रूप में लोकप्रिय हो रहा है. अगर देखा जाए तो एक गाय के स्थान पर तीन बकरियों को पालना आसान है जिससे यह पर्यावरण के अधिक अनुकूल है. बकरी का दूध पीने से बहुत लाभ हैं-

·         जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिसिन के अनुसार बकरी का दूध एक सर्वोत्तम आहार है. इस दूध की संरचना माँ के दूध से बहुत मिलती-जुलती है जिसके कारण यह आसानी से हजम हो जाता है. बकरी के दूध में पाए जाने वाले बीटा केसीन की संरचना गाय के दूध में मिलने वाले केसीन से भिन्न होती है.
·         गाय के दूध की तुलना में बकरी का दूध प्राकृतिक दृष्टि से अधिक समय तक समरूप अथवा ‘होमोजनाइज्ड’ रहता है. गाय के दूध में अग्लुटिनीन होने के कारण यह कुछ समय बाद ऊपरी वसायुक्त सतह व निचली वसा-रहित परत में विभक्त हो जाता है. दूध को समरूप बनाने के लिए इसे अत्यंत संकरे छेद में से अधिक दाब द्वारा निकाला जाता है ताकि वसा के बड़े कण टूट कर महीन हो जाएँ. इस क्रिया में दूध तो समरूप हो जाता है परन्तु कुछ अत्यंत क्रियाशील पदार्थ जैसे ‘जेंथीन ऑक्सीडेज़’ भी निकलते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं. बकरी के दूध में कोई अग्लुटिनीन नहीं होने से यह समरूप रहता है.
·         कोई एलर्जी न करने तथा गाय के दूध से अधिक पाचनशील होने के कारण भी बकरी के दूध की स्वीकार्यता अधिक पाई गई है. गाय के दूध में एलर्जी करने वाले बहुत से पदार्थ होते हैं जो बकरी के दूध में नहीं मिलते. इसलिए बकरी का दूध बच्चों के लिए सुरक्षित माना गया है.
·         इसमें प्रोटीन व अमीनो-अम्ल तो प्रचुर मात्रा में होते हैं जबकि वसा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है. अतः इसे मोटापा कम करने के लिए भी उपयुक्त माना गया है. बकरी के ताज़ा दूध में ऐसे एन्जाइम होते हैं जो कैल्शियम के बेहतर अवशोषण में सहायक हैं.
·         गाय के दूध के मुकाबले बकरी के दूध में अनिवार्य वसीय अम्ल जैसे लीनोलिक एवं एराकिडोनिक अम्ल अधिक मात्रा में मिलते हैं.
·         गाय के दूध में वसीय अम्लों की मात्रा लगभग सत्रह प्रतिशत तथा बकरी के दूध में ये पैंतीस प्रतिशत तक हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त बकरी के दूध में वसा के कण अपेक्षाकृत बहुत छोटे होते हैं तथा इसमें छोटी एवं मध्यम आकार की श्रृंखला के वसीय अम्ल गाय के दूध की तुलना में कहीं अधिक होते हैं. अतः पाचनशीलता एवं पोषण की दृष्टि से यह अधिक बेहतर होता है.
·         बकरी के दूध में प्री-बायोटिक पदार्थ होते हैं जो आँतों में पाए जाने वाले लाभदायक जीवाणुओं जैसे बाइफिडो-बैक्टिरिया की संख्या में वृद्धि करने में सहायक है. इसमें ए.टी.पी. अथवा ऊर्जायुक्त अणु भी अधिक मात्रा में मिलते हैं जो कोशिकाओं की बहुत-सी चयापचयी क्रियाओं में प्रयुक्त होता है.
·         आँतों के रोग से पीड़ित व्यक्तियों हेतु यह अधिक फायदेमंद है क्योंकि इसके सेवन से आँतों की सूजन व जलन नहीं होती है. यह दूध ताजा ही पीना चाहिए क्योंकि उबालने पर इसके एन्जाइम एवं अन्य पोषक तत्वों पर दुष्प्रभाव पड़ता है तथा इसका वसा दुर्गन्ध-युक्त होने लगता है.
·         बकरी का दूध शरीर में तेज़ाब नहीं बनने देता क्योंकि इसकी एसिड के प्रति प्रतिरोध क्षमता गाय के दूध से बेहतर होती है.
·         जो लोग लैक्टोस के कारण गाय का दूध नहीं पचा सकते, उनके लिए बकरी का दूध एक सर्वोत्तम आहार है क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत कम लैक्टोज होता है. यह गाय के दूध की तुलना में अधिक कैल्शियम, फोस्फोरस, ताम्बा, मेंगनीज़, रायबोफ्लेविन, नियासिन, विटामिन ए तथा बी-12 होने के कारण कहीं अधिक स्वास्थ्यवर्धक है.
·         बकरी के दूध में सेलेनियम नामक सूक्ष्म-मात्रिक खनिज पाया जाता है जो ऑक्सीकरण-विरोधी गुणों के कारण रोग-प्रतिरोध क्षमता को बेहतर बनाता है. अनुसंधान द्वारा गत हुआ है कि इसके दूध से लोहे व ताम्बे का चयापचय शीघ्रता से होता है.

आजकल बकरी का दूध सभी स्थानों पर आसानी से उपलब्ध नहीं होता है इसलिए अधिकतर लोग इसके लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं. विदेशों में बकरी के दूध से तैयार बहुत से ऐसे उत्पाद बेचे जाते हैं जिनमें बकरी के दूध के श्रेष्ठ गुणों को समाहित किया गया है. कुछ लोग इसके दूध की व्हे बना कर बेचते हैं जिसमें दुग्ध-प्रोटीन व प्रचुर मात्रा में खनिज मिलते हैं. इसके दूध को शून्य डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर सुखाया जाता है ताकि इसे दीर्घावधि के लिए रखा जा सके. इस प्रक्रिया में इसके संघटकों को कोई क्षति नहीं होती तथा यह ताज़े दूध के सामान ही फायदेमंद होता है. बकरी के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीनों को अलग करके भी डिब्बा बंद उत्पाद के रूप में बेचा जाता है. इसके अतिरिक्त इसके दूध से निर्मित प्रोबायोटिक पदार्थ भी मिलते हैं जो न केवल शरीर की पाचन-क्रिया बढाते हैं बल्कि रोग-प्रतिरोध क्षमता को भी बेहतर बनाते हैं. यदि बकरी के दूध से मिलने वाले फायदों पर नज़र डालें तो यह गाय के दूध से कहीं अधिक बेहतर पाया गया है.
भारत में यह अधिक लोकप्रिय नहीं है. इसे साधारणतया गाय व भैंस के दूध के साथ ही मिला कर बेचा जाता है. पिछले दिनों डेंगू की बीमारी फैलने के कारण बहुत से लोगों ने इसका उपयोग किया ताकि उनकी रोग-प्रतिरोध क्षमता बेहतर हो सके. कुछ शहरों में तो यह दूध बहुत ही ऊंचे दामों पर बेचा गया. परन्तु यह सब कुछ अल्प-कालिक ही हुआ.


आज आवश्यकता इस बात की है कि इसके दूध के विपणन पर और अधिक ध्यान दिया जाए ताकि इसकी स्वीकार्यता बढ़ सके. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमें उपभोक्ताओं को अधिक शिक्षित व जागरूक बनाने की आवश्यकता है, जो परम्परागत दृष्टि से केवल गाय या भैंस के दूध का ही सेवन करते आ रहे हैं. विश्व के अनेक देशों में बकरी के दूध को गाय के दूध से बेहतर माना जाता है. गाँवों में छोटे व मझोले किसान अपने जीवनयापन हेतु बकरियों को पालना पसंद करते हैं क्योंकि इस पर कहीं कम मात्रा में खर्च आता है. बकरी पालन हेतु न तो बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है और न ही इनके रख-रखाव पर अधिक खर्च करने की आवश्यकता पड़ती है.

Monday, March 7, 2016

बढ़ती हुई बछड़ियों को क्या खिलाएं?

स्वस्थ बछड़ियों से सर्वोत्तम गाय तैयार करना किसी भी डेयरी फार्म का मुख्य उद्देश्य हो सकता है. बछड़ियों का आहार प्रबंधन बहुत कठिन कार्य है तथा इसके लिए सकल डेयरी बज़ट का लगभग 20% भाग खर्च हो जाता है. बछड़ियों के शीघ्र यौवनावस्था में आने से इन्हें कृत्रिम गर्भाधान द्वारा प्रजनित करवाया जा सकता है ताकि प्रथम ब्यांत पर इनकी आयु अधिक न होने पाए.  सम्पूर्ण शारीरिक विकास एवं भार वृद्धि हेतु बछड़ियों को अधिक ऊर्जा एवं प्रोटीन-युक्त आहार खिलाने की आवश्यकता होती है. यौवनावस्था से पहले दैहिक भार में औसत वृद्धि अधिक होने के कारण दुग्ध-ग्रंथियों का विकास धीमी गति से होने लगता है जो भविष्य में प्रथम दुग्ध-काल की उत्पादन क्षमता को कम कर देता है. यदि प्रथम ब्यांत पर पशु की आयु दो वर्ष से अधिक न हो तो दुग्ध-काल पर इस हानि का प्रभाव कम हो सकता है. अगर बछड़ियों में जन्म से लेकर प्रथम ब्यांत की आयु तक उपयुक्त अनुमान व मूल्यांकन द्वारा आहार प्रबंधन किया जाए तो हमें आदर्श डेयरी हेतु एक बेहतर गाय प्राप्त हो सकती हैं.

दुग्ध-उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रथम ब्यांत पर होल्सटीन गाय की औसत आयु दो वर्ष या इससे कम तथा दैहिक भार 350-500 किलोग्राम तक हो सकता है बशर्ते इन्हें अधिक दाना या सान्द्र के साथ पौष्टिक चारा खिलाया जाएसंकर गायों में प्रथम ब्यांत पर दैहिक भार 300 किलोग्राम के लगभग हो सकता है. यौवनावस्था के बाद अधिक ऊर्जायुक्त आहार खिलाने से दुग्ध-ग्रंथियों के विकास में तेज़ी आती है तथा प्रथम ब्यांत के बाद मिलने वाले दूध की मात्रा भी बढ़ जाती है. अतः जन्म से यौवनावस्था तक होने वाले दैहिक एवं दुग्ध-ग्रंथियों के विकास एवं दुग्ध-उत्पादन क्षमता पर पोषण का प्रभाव सर्वाधिक होता है. दुग्ध-ग्रंथियों के विकास से ही दुग्ध-काल की सीमा तथा दुग्ध-उत्पादन क्षमता निर्धारित होती है. पशुओं में दुग्ध-ग्रंथियां भ्रूणावस्था से ही विकसित होने लगती हैं तथा जन्म के समय ही इनका बाह्य-विकास हो जाता है. इस अवस्था में दुग्ध-नलिकाएं एवं चर्बी तीव्रता से बढ़ती हैं जबकि कृपिकाओं का निर्माण नहीं होता. जन्म से तीन माह तक तथा एक वर्ष से गर्भावस्था के तीन माह तक दूध-ग्रंथियों का विकास दैहिक विकास दर के समान होता है परन्तु इसके बाद दुग्ध-ग्रंथियों का विकास तीव्र हो जाता है. होल्सटीन बछड़ियों में सबसे तेज़ दुग्ध-ग्रंथियों का विकास 3-9 महीने की आयु में होता है जबकि इनका दैहिक भार 100-200 किलोग्राम के बीच होता है. यदि इस समय इन्हें पर्याप्त पोषण न मिले तो इनकी दुग्ध-ग्रंथियां अर्धविकसित रह सकती हैं क्योंकि ग्रहण की गई ऊर्जा का अधिकतम भाग दैहिक विकास हेतु ही उपयोग हो जाता है.
गायों का दुग्ध-उत्पादन दुग्ध-कोशिकाओं की संख्या एवं इनकी स्रवण क्षमता पर निर्भर करता है. द्वितीय दुग्धकाल की तुलना में प्रथम दुग्धकाल के अंतर्गत दुग्ध-ग्रंथियों की उपचय स्थिति भिन्न होती है क्योंकि पशुओं द्वारा आहार के पोषक तत्त्व दुग्धावस्था एवं निरंतर दैहिक विकास हेतु उपयोग में लाए जाते हैं. बछड़ियों को उनकी इच्छानुसार जन्म से 50 दिन तक गाय का दूध पिलाने से दैहिक विकास तीव्रता से होता है तथा वे शीघ्रता से न केवल यौवनावस्था प्राप्त करती हैं बल्कि प्रथम दुग्धकाल में दूध भी अधिक देती हैं. बछड़ियों को दूध की बजाय 35o सेंटीग्रेड तापमान का कृत्रिम दुग्ध-संपूरक देने से भी दैहिक विकास तेज़ी से होता है तथा वे जल्दी यौवनावस्था में आ जाती हैं. बछड़ियों को बाल्टी से सीधे दूध पिलाने की बजाय कृत्रिम निप्पल द्वारा दूध पिलाना अधिक लाभदायक होता है. गाय का स्तन-पान करने वाली बछड़ियों में जन्म के बाद दैहिक भार में अधिक वृद्धि देखी गई है. दुग्ध-संपूरक में ऊर्जा एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने से बछड़ियों की दैहिक विकास दर में वृद्धि लाई जा सकती है. बछड़ियों के जन्म के 2-8 सप्ताह के बीच होने वाले तीव्र दैहिक विकास का दुग्ध-ग्रंथियों पर सकारात्मक प्रभाव देखा गया है. इस समय आहार में ऊर्जा एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने से दुग्ध-कोशिकाओं का विकास दोगुनी गति से होता है.
पशुओं में यौवनावस्था का आगमन आयु की अपेक्षा इनके शारीरिक भार पर अधिक निर्भर करता है. होल्सटीन जैसी बड़ी नस्ल की बछड़ियाँ अक्सर 9-11 माह की आयु में यौवनावस्था प्राप्त करती हैं जब इनका भार 250-280 किलोग्राम के लगभग होता है. गायों की दुग्ध-उत्पादन क्षमता इनके जन्म एवं यौवनावस्था के बीच मिलने वाले पोषण पर निर्भर करती है, परन्तु यौवनावस्था से पूर्व अत्याधिक पोषण के कारण शरीर में चर्बी का जमाव बढ़ने से दुग्ध-कोशिकाओं का विकास धीमा हो सकता है. अतः बछड़ियों के शारीरिक भार में वृद्धि 800 ग्राम प्रतिदिन से अधिक नहीं होनी चाहिए. ऐसा लगता है कि बछड़ियों को अधिक ऊर्जा-युक्त आहार देने से यौवनावस्था तो शीघ्र आ जाती है परन्तु दुग्ध-ग्रंथियों का विकास दैहिक विकास की तुलना में कम होता है. यह स्थिति दुग्ध-कोशिकाओं की संख्या एवं डी.एन.ए. की मात्रा में कमी के कारण उत्पन्न होती है.  अतः इन परिस्थितियों में बछड़ियों को संतुलित आहार दिए जाने की अधिक आवश्यकता है ताकि प्रसवोपरांत इनकी दुग्ध-उत्पादन क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. बछड़ियों में अधिक प्रोटीन-युक्त आहार देने से शारीरिक विकास तीव्रता से होता है तथा मोटापे की समस्या भी नहीं होती. इस प्रकार पशुओं के आगामी दुग्ध-काल एवं दुग्ध-उत्पादन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को रोका जा सकता है.
बछड़ियाँ आगामी दुग्ध-काल कों प्रभावित किए बिना 800 ग्राम प्रतिदिन की दर से 100-300 किलोग्राम तक शारीरिक भार प्राप्त कर सकती हैं. इसके लिए इन्हें 90-110 % तक सकल पाचक तत्वों एवं रुक्ष प्रोटीन की आवश्यकता होती है. पोषण में अधिक सान्द्र अथवा दाना देने से प्रथम दुग्ध-काल में दूध में वसा एवं इसकी मात्रा बढ़ाई जा सकती है परन्तु पशुओं को उनकी इच्छानुसार अधिक दाना देने से भी दूध का उत्पादन कम हो जाता है. ऐसा प्रतीत होता है कि दूध पैदावार हेतु बेहतर आनुवंशिक गुणों वाली बछड़ियों में मोटापा नियंत्रित करने की क्षमता भी अधिक पाई जाती है. यौवनावस्था के बाद तथा गर्भावस्था में उच्च-पोषण स्तर के कारण होने वाले अधिक दैहिक विकास दर का दुग्ध-ग्रंथियों एवं दूध के उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु पोषण गुणवत्ता के कारण प्रथम बार ब्याने वाली गायों में दुग्ध-ग्रंथियों के विकास एवं वृद्धि अवश्य प्रभावित होती है. प्रथम ब्यांत पर बेहतर दैहिक भार वाली गायों की दुग्ध-उत्पादन क्षमता भी अधिक होती है. यौवनावस्था के दौरान दिए गए उच्च-पोषण का प्रथम दुग्ध-काल के दूध उत्पादन पर तो कोई प्रभाव नहीं होता परन्तु इससे सम्पूर्ण दुग्ध-काल में हुई दैहिक भार-वृद्धि कम हो जाती है तथा गाय देरी से मद्काल प्रदर्शित करती है. यदि देखा जाए तो प्रथम दुग्ध-काल में अधिक दूध प्राप्त करने हेतु ब्यांत के समय गाय का दैहिक भार एवं यौवनावस्था के बाद उच्च-वृद्धि दर दोनों ही आवश्यक हैं.
ग्याभिन बछड़ियों को आमतौर पर कम ऊर्जा एवं अधिक रेशे वाले आहार खिलाए जाते हैं ताकि इनकी ऊर्जा-ग्राह्यता को नियंत्रित किया जा सके. प्रसवोपरांत दुग्ध-उत्पादन क्षमता को बनाए रखने हेतु ऐसा करना आवश्यक भी है. गर्भावस्था के 2-6 माह तक पोषण गुणवत्ता का प्रथम ब्यांत के बाद दुग्ध-उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु गर्भावस्था के अंतिम तीन माह में बेहतर आहार खिलाने से दूध अधिक मिलता है. पशुओं में दुग्ध-उत्पादन हेतु अधिक ऊर्जा उपलब्ध करवाने के लिए उपयुक्त पोषण नीति आवश्यक है ताकि जनन क्षमता को अधिक बेहतर बनाया जा सके. बढ़ती हुई बछड़ियों को दैहिक रख-रखाव, विकास तथा गर्भावस्था हेतु प्रोटीन-युक्त आहार की आवश्यकता होती है. अनुसंधान द्वारा ज्ञात हुआ है कि 5-10 माह की बछड़ियों को अपेक्षाकृत कम मात्रा में रुक्ष प्रोटीन खिलाने से दुग्ध-ग्रंथियों का विकास अधिक हुआ. अतः 90-220 किलोग्राम दैहिक भार वाली बछड़ियों को 16% तथा 220-360 किलोग्राम भार वाली बछड़ियों को 14.5% रुक्ष प्रोटीन देने की सिफारिश की जाती है जबकि 360 किलोग्राम से अधिक भार होने पर उन्हें 13% रुक्ष प्रोटीन दिया जा सकता है. आहार नियंत्रण एक ऎसी प्रबंधन विधि है जिसमें सीमित आहार खिला कर पशुओं की पोषण-ग्राह्यता एवं दक्षता को बेहतर बनाया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि यह विधि अधिक रेशा-युक्त आहार खिलाए जाने की तरह ही प्रभावशाली हो सकती है तथा इसका दुग्ध-उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता. वैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि प्रथम ब्यांत की होल्सटीन गायों को प्रसव पूर्व कम ऊर्जायुक्त आहार देने पर दुग्ध-काल के पहले 8 महीनों तक कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया.

निष्कर्षतः संतुलित पशु पोषण दैहिक विकास एवं भार में वृद्धि के साथ-साथ दूध कोशिकाओं में वृद्धि एवं अधिक दुग्ध-उत्पादन हेतु अत्यंत आवश्यक है. आनुवंशिक चयन के कारण पशुओं में शारीरिक वृद्धि दर भी बढ़ती है जिससे इनकी रुक्ष प्रोटीन आवश्यकता अधिक हो जाती है. अतः तेज़ी से बढ़ने वाली बछड़ियों में रुक्ष प्रोटीन व ऊर्जा के मध्य अनुपात अधिक होना चाहिए. 

Monday, February 1, 2016

'ड्राई' या सूखी गायों को क्या खिलाएं?

'ड्राई गायों से अभिप्रायः उन गायों से है जो अभी दूध नहीं दे रही हैं तथा अगले बयांत की प्रतीक्षा में हैं. यदि गायों को शुष्क-काल ('ड्राई' होने) के आरम्भ में रेशेदार एवं कम ऊर्जा-युक्त आहार दें तो प्रसवोपरांत इनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इनके पूर्णतया मिश्रित आहार में गेहूं का भूसा मिलाया जा सकता है ताकि पोषण में ऊर्जा का घनत्व कम किया जा सके. गायों में प्रसव से लगभग तीन सप्ताह पूर्व एवं तीन सप्ताह बाद का समय अत्यंत चुनौती-पूर्ण होता है. पर्याप्त आहार न मिलने से इन्हें प्रसवोपरांत दुग्ध-ज्वर, जेर न गिरना, गर्भाश्य की सूजन, जिगर संबंधी विकार एवं लंगड़ेपन जैसी अनेक व्याधियों से जूझना पड़ सकता है. चर्बी-युक्त जिगर एवं कीटोसिस के कारण स्वास्थ्य को और भी अधिक गंभीर ख़तरा हो सकता है. डेयरी फ़ार्म के लगभग आधे पशु अक्सर इस प्रकार के उपचय संबंधी विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं.  जैसे ही प्रसव का समय समीप आता है, रक्त में प्रोजेस्टीरोन की मात्रा कम होने लगती है जबकि इस्ट्रोजन हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है जिससे प्रसवकाल के आस-पास पशुओं की शुष्क पदार्थ ग्राह्यता कम हो जाती है जबकि इस समय गर्भाश्य में बढते हुए बच्चे को पोषण की सर्वाधिक आवश्यकता होती है.


प्रसवोपरांत दुग्ध-संश्लेषण एवं इसके उत्पादन को बढ़ाने हेतु लैक्टोज की आवश्यकता होती है जो ग्लूकोज से ही निर्मित होता है. आहार का अधिकतम कार्बोज या कार्बोहाइड्रेट तो रुमेन में ही किण्वित हो जाता है, अतः अतिरिक्त ग्लूकोज-माँग की आपूर्ति जिगर द्वारा प्रोपियोनेट से संश्लेषित ग्लूकोज ही कर सकता है. यदि पशु को प्रसवोपरांत आहार कम मिले तो रुमेन में प्रोपियोनेट का उत्पादन कम होने लगता है. ग्लूकोज की कुछ आपूर्ति आहार से प्राप्त अमीनो-अम्लों द्वारा भी की जाती है. इसके अतिरिक्त शरीर की जमा चर्बी का क्षरण भी ग्लूकोज संश्लेषण हेतु किया जाता है. गत एक दशक से पशु-पोषण पर होने वाले अनुसंधान में गायों की उत्पादकता बढ़ाने एवं इन्हें स्वस्थ रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. गायों की प्रसव-पूर्व शुष्क पदार्थ ग्राह्यता एवं अधिक दाना खिला कर आहार का ऊर्जा घनत्व बढ़ाया जा रहा है. इसके लिए पूर्णतया मिश्रित आहार को उपयोग में लाया जा रहा है ताकि प्रसवोपरांत गऊएँ शीघ्रातिशीघ्र अपनी खुराक बढ़ा सकें ताकि प्रसवोपरांत होने वाली स्वास्थ्य संबंधी विकारों से बचा जा सके.
शुष्क गायों की तुलना में नई बयाने वाली गायों को अधिक पोषण घनत्व वाला आहार दिया जाता है. प्रसव से एक या दो सप्ताह पहले गाय की खुराक 10-30% तक कम हो सकती है, अतः पोषण घनत्व बढ़ाने से शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी के बा-वजूद पशु को आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहते हैं. उल्लेखनीय है कि प्रसव-पूर्व शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी के कारण पशु को लगभग 2% अतिरिक्त रुक्ष प्रोटीन की आवश्यकता होती है. गायों को शुष्क-काल के आरम्भ में दीर्घावधि तक आवश्यकता से अधिक ऊर्जा-युक्त आहार देने से संक्रमणकालीन कठिनाइयों में कोई कमी नहीं होती. यदि शुष्क-काल के अंतिम दौर में गायों को अधिक ऊर्जा वाला पूर्णतया मिश्रित आहार खिलाया जाए तो वे प्रसवोपरांत शुष्क पदार्थ ग्राह्यता कम होने से ऋणात्मक ऊर्जा संतुलन की स्थिति में पहुँच जाती हैं तथा इनके रक्त में गैर-एस्टरीकृत वसीय अम्लों तथा बीटा हाइड्रोक्सीबुटाइरिक अम्लों की मात्रा बढ़ जाती है. परन्तु जिन गायों को शुष्क-काल में गेहूं का भूसा मिला कर कम ऊर्जा-युक्त आहार खिलाया गया, उनकी स्थिति कहीं बेहतर पाई गई.
स्पष्टतः जो गाय शुष्क-काल में अत्याधिक ऊर्जा प्राप्त करती हैं उन्हें कीटोसिस, वसा-युक्त जिगर एवं अन्य स्वास्थ्य संबंधी विकारों का अधिक सामना करना पड़ता है. अनुसन्धान द्वारा ज्ञात हुआ है कि शुष्क-काल के आरम्भ में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा-युक्त या भूसा मिला हुआ आहार खिलाना तथा प्रसव के निकट अधिक ऊर्जा-युक्त आहार खिलाना अधिक लाभदायक हो सकता है. प्रसवोपरांत शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कमी तथा अन्य उपचय सम्बन्धी असंतुलन मुख्यतः गाय के मोटापे से नहीं बल्कि लंबे समय तक अधिक ऊर्जा-युक्त आहार खिलाने से होते हैं. जैसे-जैसे दुग्ध्काल आगे बढ़ता है वैसे-वैसे शुष्क-काल के आरम्भ में कम ऊर्जा-युक्त आहार के कारण मिले लाभ भी कम होने लगते हैं हालांकि इसका सर्वाधिक लाभ तो दुग्ध-काल की अच्छी शुरुआत ही है.
चारे में भूसा मिलाने से इसकी मात्रा बढ़ जाती है तथा धीमी गति से पचने वाले रेशे के कारण रुमेन का स्वास्थ्य बेहतर होता है जिससे यह सामान्य ढंग से कार्य करता है तथा भरा हुआ होने के कारण ब्यांत के समय उदार की स्थिति भी प्रभावित नहीं होती. कम ऊर्जा वाले अन्य आहार जैसे ‘जों’ में इस तरह के गुण नहीं मिलते. दीर्घावधि तक आवश्यकता से अधिक ऊर्जा मिलने से इंसुलिन का प्रभाव भी कम होने लगता है. शुष्क-काल के दौरान आहार में अधिक ऊर्जा देने से प्रसव-पूर्व एक सप्ताह में शुष्क-पदार्थ ग्राह्यता कम हो जाती है. अतः शुष्क-काल में गायों की ऊर्जा ग्राह्यता कम करके इनकी प्रसवोपरांत भूख में सुधार लाया जा सकता है. ऐसा करने से शरीर के रिजर्व वसा में कोई कमी नहीं होती तथा जिगर में वसा की जमावट भी नहीं होती.  इसलिए आहार का ऊर्जा घनत्व 1.25-1.35 मेगा कैलोरी प्रति किलोग्राम शुष्क पदार्थ उपयुक्त रहता है.

उपर्युक्त तथ्यों का कदाचित यह अर्थ नहीं हो सकता कि गायों को आहार में ऊर्जा देनी ही नहीं चाहिए बल्कि इन्हें ऐसा पूर्णतया मिश्रित आहार खिलाएं जिसमें पर्याप्त पाचन योग्य प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज-लवणों की मात्रा हो. भिन्न-भिन्न प्रकार के आहार खिलाने से ऊर्जा की मात्रा पर नियंत्रण करने में कठिनाई होती है, अतः पूर्णतया मिश्रित आहार में भूसा मिलाने से ऊर्जा घनत्व को कम करना ही लाभदायक रहता है. शुष्क-काल के आरम्भ में ‘साइलेज’ के साथ शुष्क पदार्थ के आधार पर 20-30% कटा हुआ भूसा देने से ऊर्जा घनत्व 1.3 मेगा कैलोरी प्रति किलोग्राम शुष्क पदार्थ तक लाया जा सकता है. भूसे को 5 सेंटीमीटर से बारीक काटना चाहिए ताकि गाय इन्हें छोड़ कर अन्य आहार कणों को न खा जाए. सामान्यतः गायों को इस तरह के आहार खाने की आदत बनाने में एक सप्ताह तक का समय लग सकता है. सम्भव है इस दौरान इन पशुओं की दैनिक शुष्क पदार्थ ग्राह्यता में कुछ कमी आ जाए परन्तु बाद में यह सामान्य स्तर पर पहुँच जाती है. आहार में उपयोग किए गए भूसे की गुणवत्ता बेहतर होनी चाहिए. भूसा साफ़-सुथरा, सूखा एवं फफूंद से मुक्त होना चाहिए. आमतौर पर गेहूं का भूसा सर्वोत्तम रहता है क्योंकि यह रुमेन में अधिक देर तक रुक सकता है जिससे न केवल पाचन दक्षता में सुधार होता है बल्कि प्रसवोपरांत गाय के उदर की स्थिति भी सामान्य बनी रहती है. यदि पोषण के नज़रिए से देखा जाए तो भूसा महँगा लगता है परन्तु रेशों के बेहतर स्रोत एवं पाचक गुणों के कारण कोई अन्य चारा इसका स्थान नहीं ले सकता.

जब दूध सस्ता हो तो किसान क्या करें?

हमारे डेयरी किसान गाय और भैंस पालन करके अपनी मेहनत से अधिकाधिक दूध उत्पादित करने में लगे हैं परन्तु यह बड़े दुःख की बात है कि उन्हें इस ...